आने वाले कुछ दिनों मैं हम देश का 64 वां गणतंत्रता दिवस मानाने जा रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस मानते हमें 68 वर्ष होने को है। लेकिन देश और आम जनों में स्वतंत्रता के बाद भी अपने विचार रखने का वो तरीका न आया।
स्वतंत्रता के बाद भी हमें अंग्रेजो के विचारो, नीतियों , और परम्पराओ के गुलाम हैं। हम ने अपने शासक तो बदल दिए दिए। पर शासन का तरीका वही हैं, आम आदमी पहले भी शासको के गुलाम थे और अब लोकतंत्र में खुद के गुलाम हैं। हमारी प्रारंभिक सरकारों ने कुछ ऐसा नही किया जिसे आदर्श मान कर गर्व किया जा सके।
मेने जब लिखना शुरू किया तो सोचा की सरकार के वारे में लिखे। पर उन पर तो सारा देश कुछ न कुछ बोल रहा है, लिख रहा है, कह रहा है, सुना रहा है। अब तो एक और सॉफ्ट टारगेट (SOFT TARGET) तैयार हो गया या कर दिया गया। चलो अब अब अपने बारे में बात करे।।
पिछले दिनों हम ने नव वर्ष का स्वागत किया। नव वर्ष के लिए शुभ कामनाओ का ताँता 1 दिसम्बर से शुरू हो गया ...और लगातार 45 दिन चलता रहा और आते आते मकर संकर्न्ति आ गई। लेकिन उस के बीच देश की सीमओं पर ऐसा कुछ हो गया कि गुड का स्वाद ही फीका हो गया। मेरी संवेदना उन के परिवारों के साथ है। आने वाले कुछ दिनों में हम गणतंत्र दिवस मानाने जा रहे है। जिस को सिर्फ 5 दिन ही शेष है फिर अगले माह 14 को प्रेंम दिवस ( valintain day ) आ रहा है। मुझे इस बात से बडा दुःख हुआ की अभी तक मेरे पास 26 जन . के लिए कोई भी संदेश न आया। लेकिन 14 feb के लिए कुछ सलाह जरुर आ गई। मसलन " घर से बाहर न निकले कुछ लडकिया राखी बांध सकती है " सामाजिक संगठन इस दिन को काला दिवस घोषित कर सकते है " इस प्रकार से फेसबुक ट्विटर wattsapp , अन्य सामाजिक संचार तंत्र के माद्यम से सन्देश प्राप्त हुए। में कोई इन सब बातो का कोई बड़ा आलोचक नही हूँ और ना हे कोई विरोधी।
लेकिन इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि देश के युवा का रुझान राष्ट्रीय पर्व की ओंर क्यों नही है। जो की हमारी गौरव गाथा का प्रतीक है। हमें उन पर गर्व होना चाहिए।
जब सोचा तो पाया की शायद इस में इन लोगो या इस पीडी की कोई गलती नही है . शायद इन तक इस बात का महत्व या इस के लिए किये गये संघर्षों को इन तक सही तरीके से नही पहुचाया गया 1857 की क्रांति के वीरो का तो नाम लेने वाला भी नज़र नही आता। जिन्होंने अपने राज पाठ को स्वाभिमान की वेदी पर वली चड़ा दिया। वलिदान की रोगटे खड़े कर देने वाली गाथाये और सेनानियों का वलिदान हमारी स्वतंत्रता का नीव का पत्थर है और उन के आदर्शो पर ही आधुनिक भारत के इतिहास का श्री गणेश हुआ। हमारे अमर शहीद श्री मंगल पाण्डेय , तात्या टोपे , रानी लक्ष्मी बाई, बहादुर शाह जफ़र , आदि सेनानियो का योगदान आमूल्य है सारा देश भी मिलकर उस को लोटा नही सकता।
देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम प . चन्द्रशेखर आजाद के साथ शुरू हुआ और कलकता से लहोर तक फ़ैल गया। और पूरे देश मैं आजादी के लिए ललक पैदा कर दी और सब लोग अपने अपने तरीको से इस लड़ाई में बाद चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। सब ने अपना रास्ता चुन रहे थे कोई गाँधी के साथ था तो कोई स्वतंत्रता के लिए आंधी की तरह क्रान्तिकारियो के साथ आंगे बढ रहा था। पूरा देश स्वतंत्रता के संग्राम मैं अपना सबकुछ देने को तैयार थे . कुछ तो दे ही चुके थे , किसी ने धन दिया तो कोई खुद ही उन के साथ समर मैं कूद गया।
जो स्वयं समर्थ नही थे उन ने अपने एक मात्र बेटे को इस संग्राम में समर्पित कर दिया। देश की महिलाओ ने
भी इन अत्याचारियों से दो दो हाँथ करने के लिए कमर कास ली थी।
शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु , आजाद , राम प्रसाद बिस्मिल , बतुकेस्वर दत्त , मेहता साहब, ये इस संग्राम के वे नाम है जिन के बिना देश में स्वतंत्रता की बगिया के फूल खिल पाना संभव हे नही थे लेकिन ये इस देश का दुर्भाग्य है की देश के सब से पुराने पार्टी ने इन् शहीदो को क्रनतिकरियो के स्थान पर आतंकवादी घोषित कर दिया।
शहीदों के लिए एक कविता
पूजा की सच्ची विधि वे ही अपनाते हैं,
हम पूजा के हित थाल सजाते फूलों का
वे अपने हाथों, अपने शीष चढ़ाते हैं ।
जो हैं शहीद, सम्मान देश का होते वे
उत्प्रेरक होतीं उनसे कई पीढ़ियॉं हैं,
उनकी यादें, साधारण यादें नहीं कभी
यश-गौरव की मंज़िल के लिए सीढ़ियाँ हैं ।
कर्त्तव्य राष्ट्र का होता आया यह पावन
अपने शहीद वीरों का वह जयगान करे,
सम्मान देश को दिया जिन्हांेने जीवन दे
उनकी यादों का राष्ट्र सदा सम्मान करे ।
ब्लॉग आंगे भी जारी रहेगा .........
देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम प . चन्द्रशेखर आजाद के साथ शुरू हुआ और कलकता से लहोर तक फ़ैल गया। और पूरे देश मैं आजादी के लिए ललक पैदा कर दी और सब लोग अपने अपने तरीको से इस लड़ाई में बाद चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। सब ने अपना रास्ता चुन रहे थे कोई गाँधी के साथ था तो कोई स्वतंत्रता के लिए आंधी की तरह क्रान्तिकारियो के साथ आंगे बढ रहा था। पूरा देश स्वतंत्रता के संग्राम मैं अपना सबकुछ देने को तैयार थे . कुछ तो दे ही चुके थे , किसी ने धन दिया तो कोई खुद ही उन के साथ समर मैं कूद गया।
जो स्वयं समर्थ नही थे उन ने अपने एक मात्र बेटे को इस संग्राम में समर्पित कर दिया। देश की महिलाओ ने
भी इन अत्याचारियों से दो दो हाँथ करने के लिए कमर कास ली थी।
शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु , आजाद , राम प्रसाद बिस्मिल , बतुकेस्वर दत्त , मेहता साहब, ये इस संग्राम के वे नाम है जिन के बिना देश में स्वतंत्रता की बगिया के फूल खिल पाना संभव हे नही थे लेकिन ये इस देश का दुर्भाग्य है की देश के सब से पुराने पार्टी ने इन् शहीदो को क्रनतिकरियो के स्थान पर आतंकवादी घोषित कर दिया।
शहीदों के लिए एक कविता
श्रीकृष्ण सरल
देते प्राणों का दान देश के हित शहीदपूजा की सच्ची विधि वे ही अपनाते हैं,
हम पूजा के हित थाल सजाते फूलों का
वे अपने हाथों, अपने शीष चढ़ाते हैं ।
जो हैं शहीद, सम्मान देश का होते वे
उत्प्रेरक होतीं उनसे कई पीढ़ियॉं हैं,
उनकी यादें, साधारण यादें नहीं कभी
यश-गौरव की मंज़िल के लिए सीढ़ियाँ हैं ।
कर्त्तव्य राष्ट्र का होता आया यह पावन
अपने शहीद वीरों का वह जयगान करे,
सम्मान देश को दिया जिन्हांेने जीवन दे
उनकी यादों का राष्ट्र सदा सम्मान करे ।
ब्लॉग आंगे भी जारी रहेगा .........