आज फिर आप के समक्ष हूँ अपने मन की बात कहने के लिए, वह बात अलग है मन की बात कहना एक राष्ट्रीय विषय बन गया है। सरकार के मुखिया भी प्रत्येक माह अपने मन की बात एक बार जरुर बोलते है। आज समय निकालना जरुरी हो गया था क्यों कि आज शहीद-ए-आजम भगतसिंह, वीर क्रांतिकारी सुखदेव, शहीद राजगुरु का वलिदान दिवस है। ये वे नाम है जिन्होंने अपनी विचारधारा,साहस, सामर्थ्य, ज्ञान,पराक्रम, नेतृत्व क्षमता के आधार पर देश को स्वतंत्रता के मुहाने पर खड़ा कर दिया था लेकिन वह विचार धारा मुहाने पर ही सूख गई या सुखा दी गई। अपनी मनचाही मंजिल नहीं पा सकी कारण उसके सामानांतर एक और विचारधारा देश में चल रही थी जिसका प्रभाव कहीं ज्यादा व्यापक था। उस विचारधरा का नेतृत्व कर्ता खुद विचारधारा से भी बड़ा बन गया था और अभी तक बना हुआ है। वह इतना बड़ा था कि उसका प्रभाव देश ही नहीं विदेशो तक फैला हुआ था बड़ी विचारधरा के बीच दब कर रह गई एक प्रभावशाली विचार धारा जैसे एक बड़े वृक्ष के नीचे छोटे पौधे मर जाते है वैसा ही हुआ भगतसिंह जैसे वीर युवाओ के साथ।
भगतसिंह जी पर लिखे अपने पिछले लेख ( http://animeshsinghai.blogspot.in/2015/03/blog-post.html?m=1 )
में मैंने उनके नास्तिक होने का जिक्र किया था जो उन्होंने जेल में रहते हुए बाबा रणधीर सिंह के सवालो के जबाब में लिखा था । जिसे कि लाहोर के मशहूर अखबार "द पीपल" ने प्रकाशित भी किया था। उस लेख का शीर्षक था "मैं नास्तिक क्यों हूँ" इस लेख में उन्होंने अपने नास्तिक होने के पीछे का कारण स्पस्ट किया है और भगवान, ईस्वर , या कोई तीसरी शक्ति या किसी के सर्वशक्ति मान होने को केवल एक मिथ्या बताया है और बहुत ही तर्क पूर्ण तरीके से स्पस्ट किया है। लेकिन इस लेख की भारत जैसे सार्वभौमिक, लोकतंत्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में इसकी क्या आवश्यकता।यदि इस तरह का कोई लेख यदि आज लिखता तो निश्चित मानिये उस पर राष्ट्र द्रोह का मुकदमा चलता । कुछ राष्ट्र वादी चोराहो पर पुतला फूकते, फेसबुक ट्विटर आदि पर गांलिया दी जाती। आज जो युवा उनको अपना आदर्श कहते नहीं थकते है वे ही उनको पाकिस्तानी या सांप्रदायिक कह रहे होते, में ये सब इसलिए नहीं कह रहा कि में भी एक नास्तिक हूँ वल्कि इसलिए ये बात कह रहा हूँ कि आज कल हम ने दुसरो की बातो को धैर्य पूर्वक सुनना बंद कर दिया है बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया देने लगते है। कोई हमें धर्म, जाति प्रान्त, भाषा के नाम पर बरगलाता है हम बहक जाते है हमारा अपना कोई विवेक है या नहीं ???
में जब वह लेख पढता हूँ तो कुछ नया अकल्पनीय निकलकर आता है जो मुझे झकझोर देता है, इतना कुछ वैचारिक लिखना और ऐसे समय में जब देश गुलाम हो और पूरा देश खुद कुछ न कर कर एक व्यक्ति में अपनी आस्था व्यक्त कर दे। आश्चर्य है एक 20 साल का लड़का इतना कुछ और तर्क पूर्ण तरीके से कैसे कह सकता है। उनको अपने नास्तिक होने पर इतना गर्व था जितना किसी आस्तिक को अपने इश्वर या अल्लाह पर नहीं होगा। पंडित पादरी और मौलाना आदि धर्म गुरुओ ने देश को बर्बाद कर दिया है,अपनी आस्था स्वार्थ के आसपास भटकती है निस्वार्थ भाव से नास्तिक होना कोई आसन बात नहीं है। ख़ास कर तब जब फांसी का फंदा आप के सामने हो और जल्लाद कहे कि आखरी बार अपने ईश्वर का नाम लो तब भी आप के मुख से इंकलाब जिन्दावाद निकले । भगतसिंह को देश की गुलामी और निर्धन जनता की जितनी चिंता थी उतनी आज के किसी नेता या जनता के सेवको में नहीं दिखती थी। आम जनता की पीड़ा और कष्टों ने और भी प्रखर रूप से नास्तिक बना दिया। उसे यकीन हो गया ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है यदि होती तो क्रूर अंग्रेज इन मासूमो पर अत्याचार नहीं करते। यदि ईश्वर है भी तो वो भी क्रूर और निर्दय। तो फिर ऐसी सत्ता के आंगे क्यों अपना समय व्यर्थ करू जो न्याय प्रिय नहीं है।
विश्वक्रांति के महान आदर्श को पढ़कर अपने आप का निर्माण करने वाले भगत सिंह ने अराजकवादी नेता बकुनिन, साम्यवाद के पिता कार्ल मार्क्स, लेनिन, त्रास्त्की आदि को पढ़कर अपनी नास्तिकता को तर्क पूर्ण किया। आज हर कोई हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध बनना चाहते है पर इंसान नहीं बनना चाहते। आप किसी के आस्तिकता पर प्रश्न करलो उसे हैवान बनते देर न लगेगी। उसके साथ 10-12 धार्मिक लोग और आ जायेगे। पिछली बार भी कहा था इस बार फिर बोल रहा हूँ अंग्रेजी सरकार ने तो सिर्फ उनको फांसी दी थी पर उनकी हत्या तो हमारी अपनी सरकारों ने की है मुझे उम्मीद थी इस सरकार से की वह इन शहीदों के लिए कुछ करेगी, दो साल बीत जाने के बाद भी कुछ भी नहीं हुआ। शहीदों के जन्मदिन और शहीद दिवस पर सुबह सुबह tweet करो यह कैसी श्रधांजली??? भारत की अपनी सरकारों ने एक षडयंत्र पूर्वक इनकी हत्या की है। चाहे वह आजादी के बाद की नेहरु गाँधी सरकार हो या कोई और सरकार
आज गाँधी जी स्वर्ग में बैठ कर सोच रहे होंगे कि काश उस नैजवान को बचा लिया होता ???
कांग्रेस की सरकार से उम्मीद तो कभी भी नहीं थी क्यों की उनकी क्रांतिकारियों के साथ उनकी वैचारिक मतभेद थे। गाँधी जी जिस कांग्रेस को अहिंसा वादी कहते थे उसी कांग्रेस के एक प्रधानमंत्री ने देश की पहली पशुबधशाला खोली थी। उसी कांग्रेस के नेताओ ने अपने एक नेता की हत्या के प्रतिकार में हजारो हत्याये खुले आम की थी। आज(23 मार्च 2017)को भी कांग्रेस की एक सांसद लोकसभा में गैर क़ानूनी कत्लखानो पर हो रही कार्यवाही का विरोध चीख चीख कर कर रही है। अब कहाँ गया आप का अहिंसा वादी सिद्धांत ???
साथ ही साथ भगत सिंह भी सोच रहे होंगे हम ने भी किन मूर्खो के लिए अपनी जवानी बर्बाद कर दी ???
सरकारे भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारो को मार देना चाहती है, उनका नाम धीरे धीरे विलोपित करना चाहती है । ताकि उनकी सत्ता की ओर कोई आँख न दिखा सके, उनसे कोई सवाल न पूछे, उनके खिलाफ कोई सड़को पर नहीं उतरे, क्यों की ये विचारधारा स्वावलंबन की विचारधारा है। पार्क और सड़को पर अपना नाम छपवाने के लिए उन्होंने अपने प्राण नहीं दिए थे। उन्होंने भारत माँ के लिए कुछ सपने संजोये थे उन्होंने विश्व के श्रेठ विचारको और समाजवादियो को घोल घोल के पिया था। तब भारत के लिए कुछ सपने बुने थे। वे सपने क्या थे?? भगतसिंह का समाजवाद आज के लोकलुभावन डायलोग " सबका साथ सबका विकास" से कहीं ज्यादा व्यावहारिक और न्यायसंगत भी था। लेकिन पिछली सरकारों ने उनको पनपने ही नहीं दिया। आज जरुरत है भगतसिंहआदि क्रांतिकारियों के लेखो को सार्वजानिक कर के युवाओ में उनका प्रसार करने की, यदि आज के युवा लेनिन या कार्ल मार्क्स को पढले की उन्होंने अपने देश को किस तरह बदला तो वह दिन दूर नहीं जब हम भी एक स्वावलंबी समाज का निर्माण कर पायेगे। आज सरकार मुफ्त में अनाज और आदि सुविधाओ को देकर अकर्मण्यता को जो बढावा दे रही है। आज तो पाठ्य पुस्तको, स्कूलों, कॉलेजो , पुस्तकालयो से भगत सिंह और समकालीन क्रन्तिकरियो को निकाल जा रहा है । आज के बच्चो ने भगतसिंह का नाम तो सुना है पर उन्हें जानते नहीं है । इंकलाब का इक़बाल बुलंद करने वाले शहीदों के साथ ऐसा करना उनकी हत्या करने जैसा है।
मुझे तो दुःख इस बात पर होता है जिस पंजाब से भगतसिंह जैसे वीर पूत आते है आज उसी पंजाब के 80% युवा ड्रग्स और नशे के आदि हो गए है। देश की सबसे उर्जावान नस्ल नशेडी बनती रही और अकाली भाजपा सरकार सत्ता के सुख भोगती रही। उस दौर में भगतसिंह को तत्कालीन पत्रकारों और अखवारो ने बहुत मदद की उनके अदालती भाषणों को प्रमुखता से छापते थे ताकि जनता ऐसे लोगो को जानसके जो उनके लिए प्राण निछावर करने के लिए भी तैयार है लेकिन आज की पत्रकारिता मौकापरस्ती पर आधारित है आज मैंने देश के कई प्रमुख अखवारो के E-paper देखे उनसे भी भगत सिंह सुखदेव राजगुरु गायब थे। लेकिन विज्ञापनों की कोई कमी नहीं । सरकार और समाज से निवेदन है भगत सिंह जैसी विचारधारा, समाज को जिन्दा रखने के लिए बहुत ही आवश्यक है । आप कुछ तो ऐसा प्रयास करें आने वाली पीढ़ियां उन्हें सम्मान से याद कर सकें ।
भगतसिंह की हत्या की है खुद अपनी ही सरकारों ने,
शासन की स्याही से छपने वाले अखवारो ने ॥
जिसके नाम मात्र से अंग्रेजो की औलादें भी डर जाती थी,
उस स्वाभिमान की हत्या की है एक अहिंसावादी ने ॥
आपका
अनिमेष सिंघई