पिछले दिनो मेरे हाथो लगा अपने समय का सबसे विवादित और प्रतिबन्धित लेख , जिसे लिखा था स्वयं भगत सिंह ने , जेल के अंतिम दिनो मे लिखा गया यह लेख , चोरी छिपे बाहर लाया गया था| यह मात्र संयोग है कि उसके अगले दिन थी भगत सिंग ,सुखदेव , और राजगुरू की पुण्य तिथी !
अपने आदर्श पर , अपने सिधन्त पर विश्वास रखने वाला ऐसा क्रांतिकारी जो अपने आप को नास्तिक कहने पर गर्व करता हो , ईरादो मे इतना द्रण की स्वयं विशाल पर्वत भी नजरे झुका ले उसको 23 /MARCH/1931 को फासी पर लटका दिया | महात्मा जी ने मौन रहकर इसका समर्थन किया , क्या यह एक प्रकार की हिंसा नही है ? ? वे इस्लिये शान्त रहे की दोनो की विचारधारा मेल नही खाती थी उन्होने ठीक किया | वे कर सकते थे उनके कई अंध भक्त थे जो की स्वयं एक तरह की गुलामी मे जी रहे थे| किसी का बिना सोचे समझे अनुसरण करना एक तरह की गुलामी ही तो है |
"मे नास्तिक क्यो हू ?"
अव तक तीन बार पढ चुका| कुछ निश्कर्ष निकले है कुछ सवाल निकले है कुछ समाधान मिला है और बहुत दुख हुआ | एक ऐसा क्रांतिकारी जिसका उद्देश्य सर्फ स्वतंत्रता नही बल्कि एक ऐसा समाज स्थापित करना था जिसमे सब समान हो , ना पुंजीबाद , ना सम्राज्याबाद , ना ही अलोकबाद , | भगत सिंग सर्फ एक क्रांति कारी ही नही वल्कि विचारक भी थे उन्होने कभी स्वयं ,चंद्र शेखर आजाद से कहा था की "मैं भले ही मर जाऊ लेकिन हमारे विचार जिन्दा रहना चाहिये "| उन्होने अपने विचारो को जनता तक पहुचाने के लिये मध्यम बनाया था ब्रिटिश अदलतो को , पत्रकारो के माध्यम से जनता तक जाते थे संदेश , उस समय पत्रकरिता आज के बनस्पत विकाऊ नही थी |
जब सोचता हू की स्वतंत्रता के बाद उनको सम्मान जनक स्थान क्यो नही मिला ?
kya? सर्फ इसलिये की आदरणीय गांधी जी उनके विचारो से सहमत नही थे , या प्रारंभ की सरकारो को डर रहा होगा की ऐसे विचारो को प्रचारित करना स्वयं को संकट मे डालने के समान है , कुछ हिंदुओ को उनके नास्तिक होने पर भी समस्या हो सकती थी इसलिये भगत सिंह एक नाम , एक विचार , एक आक्रोश एक आग को ठंडे बस्ते मे डाल दिया गया .| उन पर लिखे लेखो , उनपर प्रकाशित पुस्तको पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिया |
जब उनका लेख " मे नास्तिक क्यो हू " का अध्यन किया तो लगा कि जितना गर्व उन्हे अपने नास्तिक होने पर है उतना तो किसी पंडित , पादरी , मौलाना को अपने आस्तिक होने पर भी नही होगा | उनके नास्तिक होने का मुख्य कारण समाज की दयनीय अवस्था रही होगी | उन्होने बहुत तर्क पूर्ण रुप से अपनी बात रखी है |
जब तक आप के मन मे मौत के बाद जन्म की लालसा , नर्क का डर और स्वर्ग की मनोकामना होगी | तब तक समाज मे समानता नही आ सकती , जब आप ये सोच लगे की जब तक हू तभी तक हू मौत के बाद कुछ भी नही तब आप भगवान के स्थान पर मानव की सेवा करेगे . .!
देश मे सरकारो का रवैया क्रतिकरियो के प्रति कभी भी सकारत्मक नही रहा , चाहे वह कोई भी रही हो | कुछ ने मजबूरी बस उनके नाम पर सडक , अस्पताल , स्कूल , पार्क , सिक्के , मैदान आदि तो बनाय| लेकिन क्या उन्होने इन सब पर अपना नाम गुदबाने के लिये मौत को गले लगाया ?
यह सब करने की अपेक्षा वे भी cong. मे शामिल होकर भजन कीर्तन करते , और बाद मे बन जाते मंत्री , नेता | लेकिन महत्व पूर्ण थे उनके विचार , उनका लेखन, उनके आदर्श , उनका समर्पण , उनका त्याग , जिसे सरकार समाप्त करना चाहती है | ताकि कोई दूसरा भगत पैदा ना हो जाय , जो इंको आंख दिखा सके जो इनसे सवाल पूछे | यदि सरकार इनका सम्मान करना चाहती है तो उन पर साहित्य को प्रकाशित कर सर्व सुलभ करे , शोध और अनुसन्धान को प्रेरणा दे , पठ्यापुस्तको मे शामिल करे , उनको तस्वीर नही विचार बनाय , उन पर टिकट नही पुस्तक छापे , उनके विचारो पर स्वतंत्र संवाद हो |
मुझे मालूम है ऐसा कोई सरकार नही करेगी , क्यो की ये डरपोक है ये नकली आदर्शबाद की सरकार है , उनको डर है यदि ऐसा किया तो ये युवा समाज खुलकर सरकार की कारगुजरियो का विरोध करेगा | क्यो तब समाज कई भगत सिंग , चंद्रशेखर , राजगुरू , मंगल , झासी की रानी , एक साथ जन्म लेने लगेगी | तब सत्ता का सुख भोगने मे मुश्किल होगा, पुंजि पतियो को मुश्किल होगी क्योकि वे स्वयं एक सम्रज्य बना कर बैठे है जिसमे इंसान एक मशीन है जिसको एक निर्धारित आउट्पुट देन है |
ब्रिटिश सरकार ने तो केवल उन को शहीद किया था लेकिन उनकी हत्या तो भारत की सरकारो ने की है |
यदि भगत सिंग के विचारो का कुछ प्रतिशत हि अनुशरण किया होता तो ये समाज बहुत पहले हि शिक्षित हो जाता , अंधविश्वास से मुक्त , लेकिन ऐसा होता क्यो ? ? यदि ऐसा होता तो लाखो पंडित, पादरी ,काजी, इमाम , ढोंगी बाबा बेरोजगार नही हो जायेगे | जो की एक मुस्त वोट बैंक का जरिया है ,सरकार बनाना परोक्ष रुप से इनका ही निर्णय है |
शेष अगली कडी मे . . आगे भी जारी रहेगा . .