शुक्रवार, 12 मार्च 2021

मुस्कुराते हुये


तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना 
और देखते रहना 
मुझे आनंदित करता है 
मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें 
थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं 
और जब तुम्हारी पुतलियां 
काजल से टकराती है 
तो लगता है जैसे 
सृष्टि ने रात को सुबह,
शाम को रात कर दिया हो.
तुम्हारे बिना 
ये राते,ये दिन, ये सुबह, ये शाम 
मुझे अच्छी नहीं लगती 
अतः मैं चाहूंगा 
किसी दिन तुम 
अचानक, मुस्कुराती हुई 
मेरे पास चली आओ !
तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा 
मन के घनघोर अँधेरे में 
उम्मीद की एक रौशनी पैदा करता है। 
मैं जानता हूँ,
तुम ! अथाह विपत्तियों और मुश्किलों में भी 
मुस्कुराने का हुनर जानती हो 
मगर मैं चाहूंगा ! 
तुम जब भी मुझसे मिलो 
अपना सारा हुनर उस तिजोरी में
बंद करके आना जिसमे  
हमारी यादें साँसे ले रही हैं। 
और आते वक़्त 
कुछ यादों के बंडल ले आना 
ताकि तुम्हारे साथ 
खिलखिलाकर अपना वक़्त बिताया जा सके 
क्यों की मुझे तुम्हारे साथ
मुस्कुराना नहीं, खिलखिलना है। 
 




शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

पतझर

झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
पहले पड़ी धूप, फिर धूल जम गई,
सारे दरख्तों की रंगत उतर गई,
मुरझा के अपनी शाख पे , कुछ पत्ते अकड़ गये,
रिश्ता जब टूटा शाख से, जमीं में मिल गए,
तनहा तनहा डाल ने कुछ दिन यूँ ही बिताये,
चिड़िया, तितली ,कोयल न कौए उसके पास आये।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से, 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे ।।
जब से तुम गई हो तो, हम भी झर गए
तुम्हारी याद में जरा टूटे और पूरे बिखर गए
ये तो जानते  थे कि बिछुड़ना है एक दिन
उमीदें फिर भी पत्ते शाख से कर गए
आया ना कोई भी इनको सँभालने 
पत्तों ने लुटा दिया सब पतझर के नाम पे।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
न कोई नाम न कोई पहचान रही
जमी पर गिरे और खाक हो गए 
गुमा था कभी फूल को अपनी महक का
चंद रोज मे ही सूख के झर गए
पूछो दरख़्त से पतझर की पीड़ाये
कांधो पे जैसे बेटे की लाश हो
जंगल कुछ पतझर में इस तरह उदास हो।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
-अनिमेष सिंघई

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

स्वतंत्रता दिवस और शादाब


जब भी १५ अगस्त और २६ जनवरी होती है तो मुझे अपने स्कूल के दोस्त याद आते है। और शादाब मेरा मेरे बचपन का वो दोस्त जिसके साथ मैंने अपने स्कूल के सबसे ज्यादा राष्ट्रीय त्यौहार मनाये है। क्लास ९ वी में हम दोनों एक साथ एक बैंच पर बैठते थे. फिर १० वी में बैंच बदली लेकिन दोस्त नहीं। क्लास ९वी का पहला स्वतंत्रता दिवस शुरू हुआ उत्कृष्ता विद्यालय से और पहुंचा तहसील ग्राउंड की परेड देखने वाह भाई वाह क्या परेड थी, उसके बाद पप्पू भाई( असाटी जी ) की चांट की दुकान पर समोसे फिर शादाब के पुराने स्कूल (आदर्श स्कूल) पहुचे और फिर घर बापसी। हमारे घर लौटने का रास्ता भी एक,  रास्ते भर ढेर सारी बातें। यह हमारा रोज का नियम था स्कूल से आराम से निकलते और बात करते करते घर जाते, और हमारी  मित्रता ऐसी कि किसी की भी नजर लग जाये। यूँ समझिये लगते लगते बच भी गई (किसी लड़की की बजह से नहीं ) बात दसवीं की है लंच में खाना  खाते खाते कोई बात निकली और हमारे "मत" भिन्न हो गए मजे लेने वालों में एक थे हमारे मित्र चौबे जी,  एक पटेल साब,   मैं और शादाब आमने सामने, बात बड़ी और बढ़ती गई हांथा पाई तक पहुंच गई मैं उसके पीछे डस्टर (असल में कुछ और) लेकर भागा, और दुर्भाग्य से मैं सीधे पंहुचा प्राचार्य कक्ष में !

जिस तरह हमारी दोस्ती मशहूर थी ठीक उसी तरह अगले २ घंटो में हमारी लड़ाई मशहूर हो गई , सब की नजर हम दोनों पर, कि कहीं छुट्टी के बाद आपस में फिर न भिड़ जाये ? छुट्टी की घंटी बजी रोज की तरह मैंने अपना बस्ता उठाया, और शादाब से दूरी बना कर चलने लगा, मन में अजब सी बैचनी थी जितनी बैचनी बढ़ रही थी उतनी ही हमारे बीच की दूरी कम होती जा रही थी क्यों की साईकिल तो हमारी आजु बाजू ही होती थी गुरु। उसने अपना बस्ता साईकिल में लगा लिया था पर अभी गया नहीं था और मैं पंहुचा बस्ता  कैरियर में फसाया, स्टैंड अलग किया, और चल पड़े हम दोनों रोज की तरह एक साथ,  पर आज हमारे बीच की बातचीत नदारत थी, एक मौन था हमारे बीच, शायद आत्म ग्लानि का मौन, फिर स्कूल से निकले, तहसील ग्राउंड पार किया, कीर्ति स्तम्भ भी निकल गय, फिर आई पत्थर खदान जहाँ "मौन हार गया" दोस्ती जीत गई,  रोज की तरह बात शुरू हुई।   किसने की यह जरुरी नहीं, जरुरी तो यह बताना है की उस दिन न मैंने sorry बोला न शादाब ने, न ही  जरुरत समझी गई,  लेकिन क्षमा हमारे स्वाभाव में था, जो हमारी बात चीत में  अंतर निहित था. 


हमेशा स्वतंत्रता दिवस पर शादाब याद आ ही जाता है क्यों की स्कूल और स्कूल के बाद भी हम ने राष्ट्रिय पर्व एक साथ मनाये है।  आज का दिन दोस्त की याद के नाम 
( आगे भी सुनाऊंगा और भी दोस्तों से जुड़े किस्से ) 




रविवार, 5 अगस्त 2018

ब्लेंक लैटर


अभी अभी शहर में गुलाबी ठण्ड ने दस्तक दी ही थी, हलकी हलकी ठंडी हवा जब छू कर गुजरती तो उसकी ठंडी गुदगुदाहट  अन्दर  तक महसूस की जा सकती थी। शाम में यदि ऐसा खुश रंग मौसम हो और चाय के साथ कचोरी मिल जाये तो जीवन का जायका भी लज्जतदार हो जाता है। गौरांग अक्सर शाम को घर लौटने से पहले शर्मा मिष्ठान भण्डार से गर्म हींग वाली कचोरी और मूंग के भजिये खा कर ही जाता, अब तक दुकान के मालिक राम गोपाल शर्मा जी से भी उसकी अच्छी जान पहचान हो गई थी। एक शाम को जब वह वहां पर कचोरी खा रहा था तभी वहां पर उसके ऑफिस में ही काम करने वाली अंशिता बैनर्जी आ गई । दोनों एक ही ऑफिस में थे पर उनके विभाग अलग अलग होने के कारण आते जाते ही देखा था उन्होंने एक दुसरे को । मुह में कचोरी चबाते हुए एक दिल फेक मुस्कराहट उसने अंशिता को दी और कदम बढ़ाते हुए उसके पास पहुच गया। उसने उसका नाम लेकर पूंछा :  "अंशिता जी आप यहाँ कैसे?" 
                                     अंशिता ने जबाब दिया " जैसे आप" और वहाँ पर ठिठक कर बैठी मुस्कराहट कब ठहाका बन गई पता नहीं चला। अगला सवाल अंशिता ने किया आप को मेरा नाम कैसे पता चला?? गौरांग ने कहाँ "लड़के अक्सर लडकियों के नाम पता कर लेते है मोहतरमा, और नहीं करते तो आस पास के लोग बता देते है रे बायो-डाटा के साथ अंशिता बोल पड़ी तो आप के पास मेरा पूरा बायो- डाटा है । 
                          उसकी बात को बीच काटते हुए गौरांग ने पूछा क्या खाना पसंद करेंगी आप ? कचोरी या कुछ और ?? अंशिता ने जबाब दिया-आप के साथ फिर  कभी और अभी तो घर पर ले जाने के लिए आई हूँ वैसे भी देर भी हो रही है। और वह अपना पार्सल लेकर घर चाली गई पर उसकी बेबाकी और खुदरंग मिजाज  गौरंग के दिल में सुनामी मचा गया। जैसे जैसे कचोरी उसके पेट में उतरती जा रही थी वैसे वैसे ही अंशिता उसके दिल, दिमाग में छा रही थी। घर पहुच कर सबसे पहले उसने अंशिता को फेसबुक पर सर्च किया पर मेहनत कुछ काम नहीं आई। गौरांग बहुत उदास हो गया, अब उसे इन्तजार था तो अगली सुबह का ताकि अंशिता को देख सके और यदि मुमकिन हुआ तो कुछ एक मिनिट मिल भी सके। जैसे तैसे रात कटी भाई साहब की, सुबह देर तक सोने वाले गौरांग साहब आज सुबह कुछ ज्यादा ही जल्दी उठ गए थे। आकर्षण में कुछ ऐसा ही जादू होता है। तैयार होकर समय से कुछ पहले ही ऑफिस पहुंच गए थे गौरांग भाई, आसमानी रंग की जींस पर कलफ की गई कॉटन की हाफ स्लीव ब्लैक शर्ट कुछ ज्यादा ही जच रही थी, चेहरे पर अलग ही रौशनी थी ।   बहुत ही बेताबी के साथ एंट्री गेट पर अंशिता का इन्तजार हो रहा था। वैसे भी इन्तजार से प्रेम बढ़ता है|  पर ये क्या, ऑफिस  आने का समय तो निकल गया था अभी तक नहीं आई थी अंशिता ।
                               उसके चेहरे की चमक फीकी पढ़ गई और बैठा हुआ दिल लेकर चुपचाप अपनी डेस्क पर पहुँच कर कॉफ़ी के गर्म घूंट के साथ वेस्वाद हुई सुबह में कुछ मिठास घोलने की कोशिश करते  हुए अपना डेस्कटॉप चालू किया, तो पिछली शाम को  तैयार की गई टू-डू लिस्ट सामने थी जो कि आज पूरे दिन में उसे पूरा करना था । गौरांग अपने काम में कुछ इस तरह व्यस्त हुआ कि उसे पता ही नहीं चला कि लंच का टाइम हो गया। वह दिन में खाना सिर्फ इसलिए खाता था कि शाम तक का समय निकल जाये और कुछ टाइम कैंटीन में दोस्तों के साथ गप-शप कर के रिलेक्स हो लिया जाये ताकि फिर से तरोताजगी के साथ काम पर लौटा जा सके। वैसे यदि कोई स्वादिस्ट टिफिन मिल जाये तो जम कर लंच कर लेते थे मिस्टर गौरांग। कैंटीन का खाना गौरांग को बिलकुल भी पसंद नहीं था कभी कभी तो वह कैंटीन जाता भी नहीं था यहाँ वहां घूम कर अपने आप को फ्रेश कर लेता था लेकिन आज जब वह कैंटीन पंहुचा तो सामने अंशिता अपने दोस्तों को कुछ मिठाईयां खिला रही थी। अंशिता को देखकर तो भाई साहब की थकान तो उतर ही गई थी पर चेहरे पर हाव भाव कुछ मिले जुले से ही थे । इसी बीच दोनों की आँखे मिली और मुस्कराहट के साथ आँखों ही आँखों में बात हुई पर पता नहीं किस ने क्या कहा  और किसने क्या समझा? गौरांग अपने मित्रो के साथ और अंशिता अपने दोस्तों के साथ,  अलग लाइन की अलग टेबल पर, परन्तु आमने और सामने,  ताकि एक दुसरे को दिखाई दें सके कुछ इस तरह से बैठ गए। खाने के बीच में चार आठ बार तो नज़रे मिल ही गई दोनो की आपस में ।लंच का टाइम ख़त्म होने के बाद गौरांग तो आ गया पर उसका मन अभी भी कैंटीन में मिठाई बाँट रही अंशित पर अटका हुआ था। वह यह ही सोच रहा था आखिर अंशिता मिठाई क्यों बाँट रही थी।
                                  यही सोचते सोचते शाम हो गई. ऑफिस से निकलते समय एक नज़र पार्किंग में खड़ी अंशिता की स्कूटी पर दौड़ाई और अपनी बाईक स्टार्ट कर रोज की तरह शर्मा मिष्ठान भण्डार पर पहुँच गए। हींग वाली कचोरी खाते खाते ही देखा कि अंशिता आज फिर वहां आ रही है। भाई साहब की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा बांछे खिल गई थी उनकी तो। अंशिता ने आते ही बैग में से मिठाई एक डिब्बा निकलते हुए गौरांग की तरफ बढ़ा दिया। इससे पहले की गौरांग कुछ पूछ पाता अंशिता ने खुद ही बता दिया कि आज उसका जन्म दिन है। गौरांग ने सिर्फ जन्म दिन की शुभकामनाये ही नहीं दी बल्कि शर्मा जी के यहाँ के प्रसिद्ध गुलाब जामुन और खोये की जलेबी कचोरी के साथ मंगवा ली साथ ही ये भी बोल दिया अंशिता को ये सब आज साथ में खाकर ही जाना होगा। कचोरी और जलेबी के बीच गौरांग और अंशिता बातों पर बांते करते जा रहे थे और समय का किसी को ध्यान ही नहीं रहा। दोनों का ध्यान जब टुटा जब अंशिता के घर से उसके मोबाईल पर फ़ोन आया। समय देखा तो 7 बज चुके थे। अंशिता ने जाने को बोला तो गौरांग ने अपने बैग में रखी हुई चोकलेट अंशिता की तरफ Happy birthday वन्स again बोलते हुए हाँथ पर रख दी। एक प्यारी सी मुस्कराहट के साथ दोनों  एक दुसरे को देखा और चल दिए अपने अपने आशियानो की तरफ।
                                     वह अंशिता में अपनी ड्रीम गर्ल को ढूढने लगा था। लेकिन वह कोई जल्दबाजी  न करते हुए पहले एक अच्छा दोस्त बनना चाहता था । अंशिता अब तो उसके सपनो में भी दस्तक देने लगी थी। अक्सर ऐसा ही होता है जब आप किसी की ऒर आकर्षित होते है तो वो जीवन का हिस्सा बन जाता है हर एक जगह आप को सिर्फ उसी का ख्याल आता है। आप सोचते है यदि वह होती तो ऐसा बोलता, ऐसा करता, यहाँ जाता वहां जाता और न जाने क्या क्या ख़याली पुलाव पकते रहते है मन में|  जितना में गौरांग को जनता हूँ तो झिजक उसके अन्दर कूट कूट के भरी है वह अंशिता का मोबाईल नंबर चाहता था पर मांगने में झिजक रहा था। पर वह कहते है न कि जिसे सच्चे दिल से चाहो तो उसे मिलाने में पूरी कायनात लग जाती है। अगले दिन हुआ भी कुछ ऐसा ही अंशिता ऑफिस से निकल रही थी तभी उसे किसी ने पीछे से आवाज लगाई बेनर्जी मेडम सुनिए तो जरा उसने पीछे मुड़ कर देखा तो वह गौरांग ही था। उसने अपने जेब से एक छोटा सा key chain निकाल कर अंशिता की हथेली पर रख दिया। वह कुछ पूछ पाती गौरांग ने कहा ये तुम्हारे जन्मदिन का गिफ्ट है, इतना कहकर वो वहां से निकल गया और पंहुचा वही शर्मा मिष्ठान भण्डार पर जैसी ही उसने अपनी गाड़ी खड़ी करी वहां पर उसने देखा कि अंशिता भी आ गई।
                                            अंशिता ने कहा आज कचोरी मेरी तरफ से दीक्षित सर के लिए।जोरदार ठहाके के साथ दोनों हस्ते रहे। बातों बातों में अंशिता ने गौरांग से उसका मोबाइल नम्बर मांग लिया,  पर गौरांग चाह कर भी उससे मोबाईल नम्बर नहीं ले सका। वह तो नम्बर लेकर चली गई पर गौरांग उसके फ़ोन,मैसेज आने का इंतज़ार करता रहा। उसदिन कोई मेसेज नहीं आया, वो आँखों में इंतज़ार लिए ही सो गया। लेकिन जब सुबह जागा तो inbox में एक सन्देश था जिसमे लिखा था GooD MorninG DixiT  SiR  :) . वो मेसेज पढ़कर गौरांग की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत रिप्लाय किया। साथ में एक Thank You भी लिखा। 
                                              फिर ऑफिस में एक फ़ोन आया उसे उठाया तो पता चला की दूसरी तरफ अंशिता है और कह रही की जो चोकलेट आप ने दी थी वो अब भी मेरे पास है और उसे आप के साथ ही मिलकर खाना है, पर ऑफिस में नहीं। फिर उस शाम को दोनों ने प्लान किया कहीं जाकर चॉकलेट खाते  है फिर सबसे से बचते बचाते, शहर भर के रास्तों में भटकते हुए , दोनों एक चौराहे के पास पहुंचे जहाँ कार्नर पर खड़े पानी पूरी वाली की दुकान पर जा कर चोकलेट खा कर आये। छोटे शहरों की यह बड़ी विडम्बना है आप किसी से स्वतंत्रता पूर्वक मिल नहीं सकते , वहां आप को कोई न कोई जनता है | फिर भी दोनों ने बड़ी हिम्मत कर कर यहाँ पर अपनी दोस्ती की पहली परीक्षा पास कर ली थी , यहाँ से शुरू हुआ सिलसिला एक आदत से बन गई, अब दोनों अक्सर एक दूसरे से फोन पर बात करते, ऑफिस में कभी कभी मिल लेते, अपने सुख दुःख, कह सुन लेते , कुछ दिनों के बाद  दोनो को एक दुसरे की कमी खलने लगी, अपने सुख-दुःख,पसंद नापसंद एक दुसरे से बांटते, एक दुसरे को देखने,मिलने ,बात करने, के बहाने ढूंढते। 
                                                 बात करने का काम आँखे करने लगी। अब कचोरी खाना तो उनके लिए सिर्फ एक बहाना बन कर रह गया था। उनके मिलने का एक मात्र स्थान जहाँ वे कुछ देर को ही सही अक्सर मिलते रहते थे। एक दिन अंशिता ने गौरांग से सैंडबिच खाने की इक्षा जाहिर की तो दोनों शहर के थोड़े कम नामी फास्टफूड रेस्टोरेंट में गए ताकि भीड़ से दूर कुछ पल सुकून के साथ बिताये जा सकें, जहाँ उनको घूरने वाली आँखे न हो। उन्होंने सैंडबिच का ऑर्डर दिया, फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला अंशिता ने बोलना सुरु किया तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और गौरांग उसे अपलक देखता जा रहा था उसकी बातों में हाँ से हाँ मिलाता जा रहा था। अंशिता बीच में एक दो बार पूछती जरुर क्या देख रहे हो गौरांग ??
गौरांग   : कुछ नहीं सिर्फ तुम्हे ??
अंशिता : पर इस तरह इतने ध्यान से क्यों ?
गौरांग  : पता नहीं आच्छा लगता है तुम्हे देखकर, तुम्हारी बातें सुनकर , तुम्हारे साथ होकर . . ! तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से नज़र हटाने का मन ही नहीं करता। बस ऐसा लगता है तुम्हे देखता रहूं
अंशिता : अच्छा अच्छा बस करो बाबा,  सैंडबिच आ गई है जरा इसे भी देख लो ।
गौरांग : कौन कम्बखत यहाँ खाने के लिए आया है
(साथ में मुनब्बर राना साहब का एक शेर भी चिपका दिया)
बस तेरी मोह्हबत में चला आया हूँ वरना,
यूँ सबके बुलाने से दीक्षित जी नहीं आते।।
                                     और जोर-जोर से से हसने लगा गौरांग। थोड़ी बहुत चमक तो अंशिता के चेहरे पर भी आ गई थी। बातों के दौरान जो आँखों और मुस्कराहट की जुगलबंदी दोनों को किसी और मुकाम पर जाने के लिए प्रेरित कर रही थी। उन्होंने वहां पर बैठ कर बहुत देर तक बहुत सारी बातें की, दोबारा कब और कहाँ मिलना है ये भी तय करते रहे, दोनों की अपनी अपनी सहमती असहमती भी थी। 
                                                            फिर यकायक गौरांग ने अंशिता की हथेली को अपनी दोनों हथेली के बीच में जम कर थाम लिया। अंशिता  थोडा सा सहम सी गई पर जब उसने गौरांग की तरफ देखा तो सारी आशंकाए, डर हवा हो गई। गौरांग ने अंशिता की गर्म हथेली का एहसास पाकर उसने कहा "इस दुनिया को भी तुम्हारी हथेली की तरह गर्म और नर्म होना चाहिये,जिसे थामने के बाद  कुछ और पाना बाकी न रह जाये। 

"क्या  हो गया है तुम्हे आज ? कैसी कैसी बाते कर रहे हो ??" 
सच बोल रहा हूँ अंशिता। 
सुनकर अंशिता थोडा चिंतित तो हो गई थी पर उसने अपनी चिंता को चेहरे पर हावी नहीं होने दिया। और वे दोनों वहां से अपने-अपने घर चले गए। शाम को अंशिता ने गौरंग को मेसेज कर के पूछा ??
अंशिता :  मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे तुम कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं रहे हो ??
गौरांग - हाँ,  कहना नहीं पूछना है।
अंशिता - हाँ पूछो न, इतना क्या सोच रहे हो ??
गौरांग- इस पूछने ना पूछने पर बहुत कुछ निर्भर करता है। 
अंशिता . . . !  हम और हमारी फ्रेंडशिप का फ्यूचर भी . !
अंशिता- ऐसा क्या पूछना है ?
गौरांग : तुम मेरी फ्रेंड तो हो ना ??
अंशिता : इसमें कुछ पूछने जैसा क्या है ? तुम्हे सिर्फ यही पूछना था?
इस मैसेज आते ही अंशिता का कॉल भी  आ गया।।
उसने पूछा क्या हुआ है आप को ?? जो भी बोलना है या पूछना हो पूछो ना ?
बातों को इतना घुमाते क्यों हो,
गौरांग - अच्छा, ठीक है ( गहरी सांस लेते हुए ) 
गौरांग - तुम अपने दिल की जवां धडकनों को गिन के बता. . .
मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं  . . . 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं   . . ?
                                           बस इतन कहते कहते उसके दिलों की धड़कने इतनी तेज़ हो गई, उसे कुछ समझ नहीं आया की उसने ये ठीक किया या नहीं दूसरी तरफ से भी कोई आवाज नहीं आ रही थी यहाँ गौरांग अपने दिल की धडकनों को नहीं संभाल पा रहा था। इसी बीच उस तरफ से अंशिता ने फ़ोन कट कर दिया। अब गौरांग और भी ज्यादा वैचैन हो उठा। वह यह निर्णय नहीं कर पा रहा था उसने कहकर सही किया या गलत। उसे एक अजीब सा महसूस हो रहा था उसे सांस लेने के लिए और अधिक ओक्सीजन की जरुरत पड़ने लगी, और वह अपने कमरे से निकल कर बालकनी पर आ गया। 
                                                    सामने के पेड़ पर पक्षियों की चहचहाट के बीच गहरी सोच में डूब गया। उसे ड़र था कहीं अंशिता उससे बात करना बंद न कर दे , हमारी दोस्ती यूँ ही ख़तम न हो जाये, उसे आत्मग्लानि भी थी उसने ऐसा क्यों बोला ? हज़ारों सवालों का सैलाब उसके अंदर उमड़ घुमड़ कर रहा था|  तभी उसके मोबाइल पर रिंग बजने लगी काल उसके घर से था पर अभी उसका बात करने का मन नहीं था तो उसने रिसीव नहीं किया। फोन बज कर बंद हुआ तो फिर एक मैसेज से चहक उठा, मैसेज अंशिता का ही था पर उसे खोलने में साहब को डर भी लग रहा था और उत्सुकता भी थी। मैसेज में एक गाने के कुछ बोल लिखे थे " तेरा मुझ से है पहले का नाता कोई यूँ ही नही दिल लुभाता कोई  . . . . ! 
                                         इतने में भाई का  फोन फिर बज उठा अबकी बार अंशिता का था फोन रिसीव किया तो "ख़ामोशी इधर भी थी उधर भी थी " कोई कुछ बोल ही नहीं रहा था, ख़ामोशी को तोड़ते हुए अंशिता बोली। मुझे आप से कुछ बताना है कल मिलोगे कहीं ? 
गौरांग : अभी बता दो 
अंशिता : नहीं अभी नही 
ठीक है कल सुबह वहीं,
हाँ वहां ठीक है।  
इतनी लम्बी रात गौरांग ने कभी महसूस नही की थी सुबह हुई तो महाशय वहां पहले से मौजूद थे पर वहां और भी जानने वाले लोगों का भय भी था इतने में अंशिता अपनी रेड कलर स्कूटी से वहां आ गई। दोनों ने बात शुरू की तो वहां से उन्हें पहचानने वाले भाई साहब उसे दिख गए, अक्सर शांत रहने वाला गौरांग असहज हो उठा और अंशिता से बिना बात करे चला गया।  कारण  सिर्फ यही कि वह लोगो को बिना मतलब बहस का कोई मौका नहीं देना चाहता था, पर इस बात पर अंशिता को गुस्सा आ गया। फिर उसने दिन भर गौरांग का कॉल रिसीव नही किया, न किसी मैसेज का जबाब दिया गौरांग के दिल में आया कि उसके घर पर जा कर मिल आए. फिर पूरा दिन गुजरने के बाद शाम को मैसेज आया, मुझे तुम्हे यह बताना था कि हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त रह सकते है इससे ज्यादा कुछ नहीं। घर वालों ने मेरे लिए लड़का पसंद कर लिया है। कुछ दिनों में मेरी शादी भी हो जाएगी।
                     गौरांग ने मैसेज पढ़ा और स्तब्ध रह गया, उसकी आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया गया, दिल की धड़कने थम सी गई, वह यह भूल सा गया की साँसे कैसे ली जाती है, उसके उतरे हुए चेहरे पर ठंडा पसीना साफ़ नजर आ रहा था, फिर उसने आव देखा न ताव सीधे अंशिता को फोन लगाया, पर ये क्या ? अंशिता ने कॉल रिसीव ही नहीं किया। दोबारा भी नहीं, तीसरी बार भी नहीं। अब गौरांग का पारा सातवे आसमान पर था कि इतने में अंशिता का मैसेज आया मै अभी बात नहीं कर सकती।  पर गौरांग फोन पर फोन लगाए जा रहा था, और जैसे ही अंशिता ने फोन उठाया और बोला, हैलो गौरांग  . . . .तुम समझ क्यों नहीं रहे हो,
सारा गुस्सा गायब, और बड़े प्यार से बोला हमेशा की तरह , हाँ अंशिता बोलो ;
                 















गुरुवार, 23 मार्च 2017

भगतसिंह की हत्यारी सरकारें-2

आज फिर आप के समक्ष हूँ अपने मन की बात कहने के लिए, वह बात अलग है मन की बात कहना एक राष्ट्रीय विषय बन गया है। सरकार के मुखिया भी प्रत्येक माह अपने मन की बात एक बार जरुर बोलते है। आज समय निकालना जरुरी हो गया था क्यों कि आज शहीद-ए-आजम भगतसिंह, वीर क्रांतिकारी सुखदेव, शहीद राजगुरु का वलिदान दिवस है।  ये वे नाम है जिन्होंने अपनी विचारधारा,साहस, सामर्थ्य, ज्ञान,पराक्रम, नेतृत्व क्षमता के आधार पर देश को स्वतंत्रता के मुहाने पर खड़ा कर दिया था लेकिन वह विचार धारा मुहाने पर ही सूख गई या सुखा दी गई। अपनी मनचाही मंजिल नहीं पा सकी कारण उसके सामानांतर एक और विचारधारा देश में चल रही थी जिसका प्रभाव कहीं ज्यादा व्यापक था। उस विचारधरा का नेतृत्व कर्ता खुद विचारधारा से भी बड़ा बन गया था और अभी तक बना हुआ है। वह इतना बड़ा था कि उसका प्रभाव देश ही नहीं विदेशो तक फैला हुआ था बड़ी  विचारधरा के बीच दब कर रह गई एक प्रभावशाली विचार धारा जैसे एक बड़े वृक्ष के नीचे छोटे पौधे मर जाते है वैसा ही हुआ भगतसिंह जैसे वीर युवाओ के साथ।
भगतसिंह जी पर लिखे अपने पिछले लेख  ( http://animeshsinghai.blogspot.in/2015/03/blog-post.html?m=1 )
 में मैंने उनके नास्तिक होने का जिक्र किया था जो उन्होंने जेल में रहते हुए बाबा रणधीर सिंह के सवालो के जबाब में लिखा था । जिसे कि लाहोर के मशहूर अखबार "द पीपल" ने प्रकाशित भी किया था। उस लेख का शीर्षक  था "मैं नास्तिक क्यों हूँ" इस लेख में उन्होंने अपने नास्तिक होने के पीछे का कारण स्पस्ट किया है और भगवान, ईस्वर , या कोई तीसरी शक्ति या किसी के सर्वशक्ति मान होने को केवल एक मिथ्या बताया है और बहुत ही तर्क पूर्ण तरीके से स्पस्ट किया है। लेकिन इस लेख की भारत जैसे सार्वभौमिक, लोकतंत्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में इसकी क्या आवश्यकता।यदि इस तरह का कोई लेख यदि आज लिखता तो निश्चित मानिये उस पर राष्ट्र द्रोह का मुकदमा चलता । कुछ राष्ट्र वादी चोराहो पर पुतला फूकते, फेसबुक ट्विटर आदि पर गांलिया दी जाती। आज जो युवा उनको अपना आदर्श कहते नहीं थकते है वे ही उनको पाकिस्तानी या सांप्रदायिक कह रहे होते,  में ये सब इसलिए नहीं कह रहा कि में भी एक नास्तिक हूँ वल्कि इसलिए ये बात कह रहा हूँ कि आज कल हम ने दुसरो की बातो को धैर्य पूर्वक सुनना बंद कर दिया है बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया देने लगते है। कोई हमें धर्म, जाति प्रान्त, भाषा के नाम पर बरगलाता है हम बहक  जाते है हमारा अपना कोई विवेक है या नहीं ???
में जब वह लेख पढता हूँ तो कुछ नया अकल्पनीय निकलकर आता है जो मुझे झकझोर देता है, इतना कुछ वैचारिक लिखना और ऐसे समय में जब देश गुलाम हो और पूरा देश खुद कुछ न कर कर एक व्यक्ति में अपनी आस्था व्यक्त कर दे। आश्चर्य है  एक 20 साल का लड़का इतना कुछ और तर्क पूर्ण तरीके से कैसे कह सकता है। उनको अपने नास्तिक होने पर इतना गर्व था जितना किसी आस्तिक को अपने इश्वर या अल्लाह पर नहीं होगा। पंडित पादरी और मौलाना आदि धर्म गुरुओ ने देश को बर्बाद कर दिया है,अपनी आस्था स्वार्थ के आसपास भटकती है निस्वार्थ भाव से नास्तिक होना कोई आसन बात नहीं है।  ख़ास कर तब जब फांसी का फंदा आप के सामने हो और जल्लाद कहे कि आखरी बार  अपने ईश्वर का नाम लो तब भी आप के मुख से इंकलाब जिन्दावाद निकले ।  भगतसिंह को  देश की गुलामी और निर्धन जनता की जितनी चिंता थी उतनी आज के किसी नेता या जनता के सेवको में नहीं दिखती थी। आम जनता की पीड़ा और कष्टों ने और भी प्रखर रूप से नास्तिक बना दिया। उसे यकीन हो गया ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है यदि होती तो क्रूर अंग्रेज इन मासूमो पर अत्याचार नहीं करते। यदि ईश्वर है भी तो वो भी क्रूर और निर्दय। तो फिर ऐसी सत्ता के आंगे क्यों अपना समय व्यर्थ करू जो न्याय प्रिय नहीं है।
विश्वक्रांति के महान आदर्श को पढ़कर अपने आप का निर्माण करने वाले भगत सिंह ने अराजकवादी नेता  बकुनिन, साम्यवाद के पिता कार्ल मार्क्स, लेनिन, त्रास्त्की आदि को पढ़कर अपनी नास्तिकता को तर्क पूर्ण किया। आज हर कोई हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध बनना चाहते है पर इंसान नहीं बनना चाहते। आप किसी के आस्तिकता पर प्रश्न करलो उसे हैवान बनते देर न लगेगी। उसके साथ 10-12 धार्मिक लोग और आ जायेगे। पिछली बार भी कहा था इस बार फिर बोल रहा हूँ अंग्रेजी सरकार ने तो सिर्फ उनको फांसी दी थी पर उनकी हत्या तो हमारी अपनी सरकारों ने की है मुझे उम्मीद थी इस सरकार से की वह इन शहीदों के लिए कुछ करेगी, दो साल बीत जाने के बाद भी कुछ भी नहीं हुआ। शहीदों के जन्मदिन और शहीद दिवस पर सुबह सुबह tweet करो यह कैसी श्रधांजली??? भारत की अपनी सरकारों ने एक षडयंत्र पूर्वक इनकी हत्या की है। चाहे वह आजादी के बाद की नेहरु गाँधी सरकार हो या कोई और सरकार
आज गाँधी जी स्वर्ग में बैठ कर सोच रहे होंगे कि काश उस नैजवान को बचा लिया होता ???
कांग्रेस की सरकार से उम्मीद तो कभी भी नहीं थी क्यों की उनकी क्रांतिकारियों के साथ उनकी वैचारिक मतभेद थे। गाँधी जी जिस कांग्रेस को अहिंसा वादी कहते थे उसी कांग्रेस के एक प्रधानमंत्री ने देश की पहली पशुबधशाला खोली थी। उसी कांग्रेस के नेताओ ने अपने एक नेता की हत्या के प्रतिकार में हजारो हत्याये खुले आम की थी। आज(23 मार्च 2017)को भी कांग्रेस की एक सांसद लोकसभा में गैर क़ानूनी कत्लखानो पर हो रही कार्यवाही का विरोध चीख चीख कर कर रही है। अब कहाँ गया आप का अहिंसा वादी सिद्धांत ???

साथ ही साथ भगत सिंह भी सोच रहे होंगे हम ने भी किन मूर्खो के लिए अपनी जवानी बर्बाद कर दी ???

सरकारे भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारो को मार देना चाहती है, उनका नाम धीरे धीरे विलोपित करना चाहती है । ताकि उनकी सत्ता की ओर कोई आँख न दिखा सके, उनसे कोई सवाल न पूछे, उनके खिलाफ कोई सड़को पर नहीं उतरे, क्यों की ये विचारधारा स्वावलंबन की विचारधारा है। पार्क और सड़को पर अपना नाम छपवाने के लिए उन्होंने अपने प्राण नहीं दिए थे। उन्होंने भारत माँ के लिए कुछ सपने संजोये थे उन्होंने विश्व के श्रेठ विचारको और समाजवादियो को घोल घोल के पिया था। तब भारत के लिए कुछ सपने बुने थे। वे सपने क्या थे?? भगतसिंह का समाजवाद आज के लोकलुभावन डायलोग " सबका साथ सबका विकास" से कहीं ज्यादा व्यावहारिक और न्यायसंगत भी था। लेकिन पिछली सरकारों ने उनको पनपने ही नहीं दिया। आज जरुरत है भगतसिंहआदि क्रांतिकारियों के लेखो को सार्वजानिक कर के युवाओ में उनका प्रसार करने की, यदि आज के युवा लेनिन या कार्ल मार्क्स को पढले की उन्होंने अपने देश को किस तरह बदला तो वह दिन दूर नहीं जब हम भी एक स्वावलंबी समाज का निर्माण कर पायेगे। आज सरकार मुफ्त में अनाज और आदि सुविधाओ को देकर अकर्मण्यता को जो बढावा दे रही है। आज तो पाठ्य पुस्तको, स्कूलों, कॉलेजो , पुस्तकालयो से भगत सिंह और समकालीन क्रन्तिकरियो को निकाल जा रहा है । आज के बच्चो ने भगतसिंह का नाम तो सुना है पर उन्हें जानते नहीं है । इंकलाब का इक़बाल बुलंद करने वाले शहीदों के साथ ऐसा करना उनकी हत्या करने जैसा है। 
मुझे तो दुःख इस बात पर होता है जिस पंजाब से भगतसिंह जैसे वीर पूत आते है आज उसी पंजाब के 80% युवा ड्रग्स और नशे के आदि हो गए है। देश की सबसे उर्जावान नस्ल नशेडी बनती रही और अकाली भाजपा सरकार सत्ता के सुख भोगती रही। उस दौर में भगतसिंह को तत्कालीन पत्रकारों और अखवारो ने बहुत मदद की उनके अदालती भाषणों को प्रमुखता से छापते थे ताकि जनता ऐसे लोगो को जानसके जो उनके लिए प्राण निछावर करने के लिए भी तैयार है लेकिन आज की पत्रकारिता मौकापरस्ती पर आधारित है आज मैंने देश के कई प्रमुख अखवारो के E-paper  देखे उनसे भी भगत सिंह सुखदेव राजगुरु गायब थे। लेकिन विज्ञापनों की कोई कमी नहीं । सरकार और समाज से निवेदन है भगत सिंह जैसी विचारधारा, समाज को जिन्दा रखने के लिए बहुत ही आवश्यक है ।  आप कुछ तो ऐसा प्रयास करें आने वाली पीढ़ियां उन्हें सम्मान से याद कर सकें । 


भगतसिंह की हत्या की  है खुद अपनी ही सरकारों ने,

 शासन की स्याही से छपने वाले अखवारो ने ॥ 

जिसके नाम मात्र से अंग्रेजो की औलादें भी डर जाती थी,

 उस स्वाभिमान की हत्या की है एक अहिंसावादी ने ॥ 


आपका

अनिमेष सिंघई 



बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

प्रिय छात्र नेताओ

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रिय छात्र नेताओ,

देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान में पढने का गौरव प्राप्त है आप इस के लिए बधाई के पात्र है। हम तो सपने में भी कभी वहां पहुचने की नहीं सोच सकते। इसी विश्व विद्यालय से देश के तमाम नामचीन नेता निकले है जिनके नाम बड़े और दर्शन दुर्लभ है। खास कर अपने क्षेत्र में। आप लोग भी वही से राजनीती शुरू कर रहे है पर आप से निवेदन है आप वह न करे जो उन्होंने देश के साथ किया है। मुझे दिल्ली से 1000 कि. मी. दूर बैठकर नहीं पता क्या सही है या गलत । कौन सही है ?? यह भी नहीं पता . . । 
वहां पर हो रही राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरुरी है लेकिन हर बार मार-पीट ठीक नहीं। किसी भी तरह के हक़ या न्याय के लिए हिंसा कभी भी सही माध्यम नहीं है।  यदि आप सही में बदलाव लाना चाहते हो तो, तब आप मौन क्यों हो जाते हो जब सत्ता पक्ष और विपक्ष महीने भर सदन चलने नहीं देता। शायद इसलिए कि आप को हुडदंग करने के लिए चंदा सफ़ेद खादी में बैठे हुए काले लोग देते है। वृताकार परिसर (संसद) में बैठे हुए लगभग 750 लोग राष्ट्र हित में काम करने लगे तो आप को इस तरह सड़को पर उतरने की जरुरत न पड़े। जब कोई नेता घटिया बयान देता है तब कहाँ जाती है आप की राष्ट्र भक्ति? शायद तब कोई पार्टीपति आप को लजीज कबाब और विदेशी शराब थमाँ जाता होगा । हम सभी जानते है एक बार भीष्म और द्रोण जैसे मनीषियों का मौन का परिणाम एक युद्ध की परिणति के रूप में हुआ था आज हमारे देश न जाने कितने भीष्म मौन साधना में लगे है। जिनको न्याय करना है सत्य और असत्य का निर्णय करना है में मूक दर्शक बने हुए है  तब शांत क्यों थे जब व्यापम की पोल खुल रही थी जब कहाँ गया था आप का जनआक्रोश ?? शायद तब आप की पार्टी के बड़े नेता के छोटे बेटे फसते नजर आ रहे होंगे।सस्ती लोकप्रियता आप को मशहूर बना सकती है पर मजबूत नहीं।
देश के तमाम छात्र नेता आप का अनुशरण करते है आप उनको क्या सन्देश देना चाहते है। झुण्ड बनाकर पुलिस की गाड़ी फुकना और निहतथे प्रोफेसरों को मरना लोकतंत्र है तो मुझे ऐसे लोकतंत्र की कोई आवश्यकता नहीं है। लोकतंत्र आप को किसी को मारने की इजाजत नहीं देता। आप आवाज उठाये, हम स्वर देंगे और जमकर देंगे। तब कहाँ चले जाते है रवीश जी, विनोद दुआ जी, सरदेसाई जी, मेडम बरखा दत्त जी. सत्ता के तलुए चाटती पत्रकारिता यदि आवाज न सुने तो सोशल मिडिया को आवाज बनाये। कहाँ है महान चिन्तक विचारक पुरुष्कार बापसी वाले राष्ट्रभक्त भारतीय। आप यदि देश में राष्ट्र्वाद चाहते है तो भगतसिंह , चंद्रशेखर, नेता जी सुभाषचन्द्र, लेनिन आदि क्रांतिकारियो के विचारो को सार्वजनिक करे देश में एक नई विचारधारा निकलेगी।
-अनिमेष सिंघई

नोट: में किसी भी तरह का भाजपाई, कांग्रेसआई, सपाई,बसपाई,संघाई, या आपापाई नहीं हूँ।

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

सुनो सांसदों . . .

मेरे राष्ट्र के तथातथित निर्माताओ. . (मतलब राजनेताओ)
आपको सादर नमस्कार . . आप में से बहुतो की उम्र तो प्रणाम और चरणस्पर्श करने की है पर आपके कार्य और हरकते देखकर मेरा अंतरमन सिर्फ औपचारिकता पूर्ण करने के लिए नमस्कार कर रहा है।

पहले स्पस्ट कर दूँ में यानि की अनिमेष सिंघई ना पत्रकार हूँ , ना किसी पार्टी का सदस्य, और ना ही किसी संघटन का कार्यकर्त्ता। में भारतीय नागरिक हूँ जिसे संविधान के अनुसार मतदान का अधिकार है, एवं निर्वाचित प्रतिनिधि से अपनी समस्या कहने और सवाल करने का पूरा अधिकार है।

अब सुनिए . . .

पिछले दो हफ्तों से संसद में आप सब ने हंगामा मचा रखा है, दो कोड़ी का भी काम नहीं हुआ पिछले दिनों, संभव है आप 545+230 सांसदों का समय महत्वपूर्ण ना हो पर पर देश की 125 करोड़ जनता का एक एक सेकंड महत्त्व पूर्ण है जिसे आप जैसे लोग नहीं समझ रहे। आप को वहां पर समस्याओ का हल खोजने के लिए भेजा गया है पर आप की कार्यविधि देखकर लगता है आप देश के लिए खुद एक समस्या बन गए है। सुबह 11 बजे संसद का माहौल का ठीक वैसा ही रहता है जैसा हमारी गली में रात 11 बजे सारे कुत्ते एक साथ आकर भौकते रहते है बिना ये समझे की उनके भौकने से देश की आम जनता को कितनी तकलीफ हो रही है। विपक्ष के कुछ नेताओ को देख कर मुझे लडैयों सियारो की याद तक आ चुकी है जो शमशान में मृत शरीर की हड्डियों के लिए इसी तरह की चिल्लम चिल्ली करते है। आप लोगो को भी कई बार किसी की मौत को मुद्दा बनाते देखा है। आप ये क्यों भूल जाते है आप हमारे प्रतिनिधि है आप हमारी आवाज वहां पंहुचानी है लेकिन आप को तो अपनी राजनैतिक रोटियां बनानी होती है। बहुत पसंद है आप को ऐसी वेदना में डूबी हुई खून से सनी हुई,दंगो में पकी हुई, भ्रस्टाचार में चुपड़ी हुई रोटियाँ।

आज देश में परिवर्तन की नई बयार चली है पता नहीं यह अपने उद्देश्य को हासिल करेगी या नहीं ? देश का आम नागरिक परेशान है उसकी समस्या कैसे कम की जाये इस विषय पर विपक्ष के किसी नेता एक भी सुझाव या बयान नहीं दिया वल्कि सरकार की आलोचना की- जानता हूँ विरोध करना आप का काम है । आप विरोध करे पर पर तरीका ये नहीं होना चाहिए। मैंने जब सेकेंडरी स्कूल में राजनीती शास्त्र पढ़ा तो उसमे मैंने पढ़ा था किस की क्या भूमिका और कार्यक्षेत्र है। लेकिन जब आप प्रधान मंत्री जी से बात बात पर जबाब मांगते तो समझ नहीं आता की वे प्रधान मंत्री है या हल्लू के दादा। देश के किसी स्थान पर यदि कोई घटना होती और कोई व्यक्ति उस कारण से मरता है तो उसके लिए प्रधान मंत्री कैसे जिम्मेदार हो सकता है । जिम्मेदार होना चाहिए वहां के  प्रशासन जन प्रतिनिधि  सरपंच विधायक नगरपालिका आदि को ! लेकिन आप उन से नहीं पूछेगे क्यों उस में आप की पोल खुल जायेगी। आप के जमीनी फण्ड और सियासीचाल बाजियां वही से चलती है क्यों नहीं होती किसी जिम्मेदार पर कार्यवाही ?? आप भी राज्य सरकारों में है?

आप ने  धर्म,जात, पन्त , क्षेत्र, भाषा , रंग के नाम पर इस देश को इतने हिस्से में बाँट दिया है अब खुद से संभाला नहीं जा रहा। अपने 60 वर्ष के शासन काल में आप ने इस देश को सहन करने की इतनी सहनशक्ति दी है कि अब ये आप की जहिल, गैरजिम्मेदार,  अलोकतांत्रिक हरकतों को रोज सहन करता है और उफ़ तक नहीं करता। आप को संसद में भेजा गया है बहस करने के लिए आप तो उसे पता नही क्या समझ बैठे है। आप की पार्टी ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए है आप उस की नाक कटवा रहे है। और ये फर्जी समाजवादी और कम्युनिष्ट अपने महान नेताओ को लजा रहे है । आदरणीय दीदी बंगाल से भारतीय राजनीती में दो दादा रहे है और उन्होंने अपने काल में इस संसद का मान ही नहीं बढाया बल्कि गौरवान्वित भी किया। हाँ में बात कर रहा हूँ सोमनाथ दा, और प्रणव दा की , आप उनसे कुछ तो सीखिए । आप को खिसयानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचे जा रही है। और आप के भाई प्रातः स्मरणीय, चंचल , नटखट मनोहारी देश को गंभीर हास्य और खांस देने वाले आदरणीय अरविन्द जी केजरीवाल। उनके लिए एक शेर याद आता है बशीर बद्र साहब का

" अदब की हद में हूँ अब अदब नहीं होता
  वो भी सुना है उसने जो मेने कहाँ नहीं "

नियम अनुसार किसी भी शासकीय या प्राइवेट कर्मचारी को वेतन तभी मिलता है जब वह कम से कम प्रतिदिन 8 घंटे कार्य करता है। यदि यह नियम संसद, विधानसभा, नगर निगम और नगर पालिका में लागू कर दिया जाये तो ?? जब तक आप 8 घंटे ऑन रिकॉर्ड कार्य नहीं करते उस दिन का वेतन भत्ते सहित काट लिए जाये। वो भी सभी का एक साथ ताकि बाकी दुसरो के कार्य में बाधा न उत्पन्न करें। निश्चित मानिये यदि ऐसा होता है तो इस देश की तस्वीर एक ही वर्ष में बदल जायेगी । आप को विरोध करना है करो सुबह से शाम तक करो लेकिन शाम से रात तक संसद चलाओ । नोट बंदी के बाद पूरा देश किसी न किसी स्तर पर परेशान है वह संसद की तरफ आशा से देख रहा है कि विपक्ष और सरकार मिलकर उनके लिए कुछ बेहतर कदम उठायेगे। पर अब इस देश की आप से उम्मीद कम हो रही है। आप सब तो बड़े नेता लोग है हमारे यहाँ छोटी सी जगह की भी यही हालत है। मुझे लगता है में भैस के आंगे बीन बजा रहा हूँ।

अभी अभी खबर मिली है कि आदरणीय जयललिता जी का लम्बी बीमारी के बाद स्वर्गवास हो गया। तमिलनाड की जनता उनको यूँ ही "अम्मा" नहीं बुलाती थी। वल्कि उनके कार्य भी एक अपने राज्य की जनता के लिए एक माँ के सामान ही थे। गरीवो के लिए भोजन सुलभ कराना आसन कार्य नहीं है। इश्वर उनकी आत्मा को शांति दें। ॐ शांति . . शांति. . शांति . . !

लिखने का मन बहुत था पर आज के लिए इतना काफी है।

आपका
अनिमेष

मुस्कुराते हुये

तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना  और देखते रहना  मुझे आनंदित करता है  मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें  थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं  और जब तुम्हारी ...