Animesh Singhai
शुक्रवार, 12 मार्च 2021
मुस्कुराते हुये
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020
पतझर
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
सारे दरख्तों की रंगत उतर गई,
मुरझा के अपनी शाख पे , कुछ पत्ते अकड़ गये,
रिश्ता जब टूटा शाख से, जमीं में मिल गए,
तनहा तनहा डाल ने कुछ दिन यूँ ही बिताये,
चिड़िया, तितली ,कोयल न कौए उसके पास आये।।
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे ।।
तुम्हारी याद में जरा टूटे और पूरे बिखर गए
ये तो जानते थे कि बिछुड़ना है एक दिन
उमीदें फिर भी पत्ते शाख से कर गए
आया ना कोई भी इनको सँभालने
पत्तों ने लुटा दिया सब पतझर के नाम पे।।
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
जमी पर गिरे और खाक हो गए
गुमा था कभी फूल को अपनी महक का
चंद रोज मे ही सूख के झर गए
पूछो दरख़्त से पतझर की पीड़ाये
कांधो पे जैसे बेटे की लाश हो
जंगल कुछ पतझर में इस तरह उदास हो।।
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
गुरुवार, 16 अगस्त 2018
स्वतंत्रता दिवस और शादाब
जब भी १५ अगस्त और २६ जनवरी होती है तो मुझे अपने स्कूल के दोस्त याद आते है। और शादाब मेरा मेरे बचपन का वो दोस्त जिसके साथ मैंने अपने स्कूल के सबसे ज्यादा राष्ट्रीय त्यौहार मनाये है। क्लास ९ वी में हम दोनों एक साथ एक बैंच पर बैठते थे. फिर १० वी में बैंच बदली लेकिन दोस्त नहीं। क्लास ९वी का पहला स्वतंत्रता दिवस शुरू हुआ उत्कृष्ता विद्यालय से और पहुंचा तहसील ग्राउंड की परेड देखने वाह भाई वाह क्या परेड थी, उसके बाद पप्पू भाई( असाटी जी ) की चांट की दुकान पर समोसे फिर शादाब के पुराने स्कूल (आदर्श स्कूल) पहुचे और फिर घर बापसी। हमारे घर लौटने का रास्ता भी एक, रास्ते भर ढेर सारी बातें। यह हमारा रोज का नियम था स्कूल से आराम से निकलते और बात करते करते घर जाते, और हमारी मित्रता ऐसी कि किसी की भी नजर लग जाये। यूँ समझिये लगते लगते बच भी गई (किसी लड़की की बजह से नहीं ) बात दसवीं की है लंच में खाना खाते खाते कोई बात निकली और हमारे "मत" भिन्न हो गए मजे लेने वालों में एक थे हमारे मित्र चौबे जी, एक पटेल साब, मैं और शादाब आमने सामने, बात बड़ी और बढ़ती गई हांथा पाई तक पहुंच गई मैं उसके पीछे डस्टर (असल में कुछ और) लेकर भागा, और दुर्भाग्य से मैं सीधे पंहुचा प्राचार्य कक्ष में !
जिस तरह हमारी दोस्ती मशहूर थी ठीक उसी तरह अगले २ घंटो में हमारी लड़ाई मशहूर हो गई , सब की नजर हम दोनों पर, कि कहीं छुट्टी के बाद आपस में फिर न भिड़ जाये ? छुट्टी की घंटी बजी रोज की तरह मैंने अपना बस्ता उठाया, और शादाब से दूरी बना कर चलने लगा, मन में अजब सी बैचनी थी जितनी बैचनी बढ़ रही थी उतनी ही हमारे बीच की दूरी कम होती जा रही थी क्यों की साईकिल तो हमारी आजु बाजू ही होती थी गुरु। उसने अपना बस्ता साईकिल में लगा लिया था पर अभी गया नहीं था और मैं पंहुचा बस्ता कैरियर में फसाया, स्टैंड अलग किया, और चल पड़े हम दोनों रोज की तरह एक साथ, पर आज हमारे बीच की बातचीत नदारत थी, एक मौन था हमारे बीच, शायद आत्म ग्लानि का मौन, फिर स्कूल से निकले, तहसील ग्राउंड पार किया, कीर्ति स्तम्भ भी निकल गय, फिर आई पत्थर खदान जहाँ "मौन हार गया" दोस्ती जीत गई, रोज की तरह बात शुरू हुई। किसने की यह जरुरी नहीं, जरुरी तो यह बताना है की उस दिन न मैंने sorry बोला न शादाब ने, न ही जरुरत समझी गई, लेकिन क्षमा हमारे स्वाभाव में था, जो हमारी बात चीत में अंतर निहित था.
हमेशा स्वतंत्रता दिवस पर शादाब याद आ ही जाता है क्यों की स्कूल और स्कूल के बाद भी हम ने राष्ट्रिय पर्व एक साथ मनाये है। आज का दिन दोस्त की याद के नाम
( आगे भी सुनाऊंगा और भी दोस्तों से जुड़े किस्से )
रविवार, 5 अगस्त 2018
ब्लेंक लैटर
गौरांग ने मैसेज पढ़ा और स्तब्ध रह गया, उसकी आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया गया, दिल की धड़कने थम सी गई, वह यह भूल सा गया की साँसे कैसे ली जाती है, उसके उतरे हुए चेहरे पर ठंडा पसीना साफ़ नजर आ रहा था, फिर उसने आव देखा न ताव सीधे अंशिता को फोन लगाया, पर ये क्या ? अंशिता ने कॉल रिसीव ही नहीं किया। दोबारा भी नहीं, तीसरी बार भी नहीं। अब गौरांग का पारा सातवे आसमान पर था कि इतने में अंशिता का मैसेज आया मै अभी बात नहीं कर सकती। पर गौरांग फोन पर फोन लगाए जा रहा था, और जैसे ही अंशिता ने फोन उठाया और बोला, हैलो गौरांग . . . .तुम समझ क्यों नहीं रहे हो,
सारा गुस्सा गायब, और बड़े प्यार से बोला हमेशा की तरह , हाँ अंशिता बोलो ;
.
गुरुवार, 23 मार्च 2017
भगतसिंह की हत्यारी सरकारें-2
भगतसिंह जी पर लिखे अपने पिछले लेख ( http://animeshsinghai.blogspot.in/2015/03/blog-post.html?m=1 )
में जब वह लेख पढता हूँ तो कुछ नया अकल्पनीय निकलकर आता है जो मुझे झकझोर देता है, इतना कुछ वैचारिक लिखना और ऐसे समय में जब देश गुलाम हो और पूरा देश खुद कुछ न कर कर एक व्यक्ति में अपनी आस्था व्यक्त कर दे। आश्चर्य है एक 20 साल का लड़का इतना कुछ और तर्क पूर्ण तरीके से कैसे कह सकता है। उनको अपने नास्तिक होने पर इतना गर्व था जितना किसी आस्तिक को अपने इश्वर या अल्लाह पर नहीं होगा। पंडित पादरी और मौलाना आदि धर्म गुरुओ ने देश को बर्बाद कर दिया है,अपनी आस्था स्वार्थ के आसपास भटकती है निस्वार्थ भाव से नास्तिक होना कोई आसन बात नहीं है। ख़ास कर तब जब फांसी का फंदा आप के सामने हो और जल्लाद कहे कि आखरी बार अपने ईश्वर का नाम लो तब भी आप के मुख से इंकलाब जिन्दावाद निकले । भगतसिंह को देश की गुलामी और निर्धन जनता की जितनी चिंता थी उतनी आज के किसी नेता या जनता के सेवको में नहीं दिखती थी। आम जनता की पीड़ा और कष्टों ने और भी प्रखर रूप से नास्तिक बना दिया। उसे यकीन हो गया ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है यदि होती तो क्रूर अंग्रेज इन मासूमो पर अत्याचार नहीं करते। यदि ईश्वर है भी तो वो भी क्रूर और निर्दय। तो फिर ऐसी सत्ता के आंगे क्यों अपना समय व्यर्थ करू जो न्याय प्रिय नहीं है।
आज गाँधी जी स्वर्ग में बैठ कर सोच रहे होंगे कि काश उस नैजवान को बचा लिया होता ???
साथ ही साथ भगत सिंह भी सोच रहे होंगे हम ने भी किन मूर्खो के लिए अपनी जवानी बर्बाद कर दी ???
भगतसिंह की हत्या की है खुद अपनी ही सरकारों ने,
शासन की स्याही से छपने वाले अखवारो ने ॥
जिसके नाम मात्र से अंग्रेजो की औलादें भी डर जाती थी,
उस स्वाभिमान की हत्या की है एक अहिंसावादी ने ॥
आपका
अनिमेष सिंघई
बुधवार, 22 फ़रवरी 2017
प्रिय छात्र नेताओ
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रिय छात्र नेताओ,
देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान में पढने का गौरव प्राप्त है आप इस के लिए बधाई के पात्र है। हम तो सपने में भी कभी वहां पहुचने की नहीं सोच सकते। इसी विश्व विद्यालय से देश के तमाम नामचीन नेता निकले है जिनके नाम बड़े और दर्शन दुर्लभ है। खास कर अपने क्षेत्र में। आप लोग भी वही से राजनीती शुरू कर रहे है पर आप से निवेदन है आप वह न करे जो उन्होंने देश के साथ किया है। मुझे दिल्ली से 1000 कि. मी. दूर बैठकर नहीं पता क्या सही है या गलत । कौन सही है ?? यह भी नहीं पता . . ।
वहां पर हो रही राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरुरी है लेकिन हर बार मार-पीट ठीक नहीं। किसी भी तरह के हक़ या न्याय के लिए हिंसा कभी भी सही माध्यम नहीं है। यदि आप सही में बदलाव लाना चाहते हो तो, तब आप मौन क्यों हो जाते हो जब सत्ता पक्ष और विपक्ष महीने भर सदन चलने नहीं देता। शायद इसलिए कि आप को हुडदंग करने के लिए चंदा सफ़ेद खादी में बैठे हुए काले लोग देते है। वृताकार परिसर (संसद) में बैठे हुए लगभग 750 लोग राष्ट्र हित में काम करने लगे तो आप को इस तरह सड़को पर उतरने की जरुरत न पड़े। जब कोई नेता घटिया बयान देता है तब कहाँ जाती है आप की राष्ट्र भक्ति? शायद तब कोई पार्टीपति आप को लजीज कबाब और विदेशी शराब थमाँ जाता होगा । हम सभी जानते है एक बार भीष्म और द्रोण जैसे मनीषियों का मौन का परिणाम एक युद्ध की परिणति के रूप में हुआ था आज हमारे देश न जाने कितने भीष्म मौन साधना में लगे है। जिनको न्याय करना है सत्य और असत्य का निर्णय करना है में मूक दर्शक बने हुए है तब शांत क्यों थे जब व्यापम की पोल खुल रही थी जब कहाँ गया था आप का जनआक्रोश ?? शायद तब आप की पार्टी के बड़े नेता के छोटे बेटे फसते नजर आ रहे होंगे।सस्ती लोकप्रियता आप को मशहूर बना सकती है पर मजबूत नहीं।
देश के तमाम छात्र नेता आप का अनुशरण करते है आप उनको क्या सन्देश देना चाहते है। झुण्ड बनाकर पुलिस की गाड़ी फुकना और निहतथे प्रोफेसरों को मरना लोकतंत्र है तो मुझे ऐसे लोकतंत्र की कोई आवश्यकता नहीं है। लोकतंत्र आप को किसी को मारने की इजाजत नहीं देता। आप आवाज उठाये, हम स्वर देंगे और जमकर देंगे। तब कहाँ चले जाते है रवीश जी, विनोद दुआ जी, सरदेसाई जी, मेडम बरखा दत्त जी. सत्ता के तलुए चाटती पत्रकारिता यदि आवाज न सुने तो सोशल मिडिया को आवाज बनाये। कहाँ है महान चिन्तक विचारक पुरुष्कार बापसी वाले राष्ट्रभक्त भारतीय। आप यदि देश में राष्ट्र्वाद चाहते है तो भगतसिंह , चंद्रशेखर, नेता जी सुभाषचन्द्र, लेनिन आदि क्रांतिकारियो के विचारो को सार्वजनिक करे देश में एक नई विचारधारा निकलेगी।
-अनिमेष सिंघई
नोट: में किसी भी तरह का भाजपाई, कांग्रेसआई, सपाई,बसपाई,संघाई, या आपापाई नहीं हूँ।
बुधवार, 7 दिसंबर 2016
सुनो सांसदों . . .
मेरे राष्ट्र के तथातथित निर्माताओ. . (मतलब राजनेताओ)
आपको सादर नमस्कार . . आप में से बहुतो की उम्र तो प्रणाम और चरणस्पर्श करने की है पर आपके कार्य और हरकते देखकर मेरा अंतरमन सिर्फ औपचारिकता पूर्ण करने के लिए नमस्कार कर रहा है।
पहले स्पस्ट कर दूँ में यानि की अनिमेष सिंघई ना पत्रकार हूँ , ना किसी पार्टी का सदस्य, और ना ही किसी संघटन का कार्यकर्त्ता। में भारतीय नागरिक हूँ जिसे संविधान के अनुसार मतदान का अधिकार है, एवं निर्वाचित प्रतिनिधि से अपनी समस्या कहने और सवाल करने का पूरा अधिकार है।
अब सुनिए . . .
पिछले दो हफ्तों से संसद में आप सब ने हंगामा मचा रखा है, दो कोड़ी का भी काम नहीं हुआ पिछले दिनों, संभव है आप 545+230 सांसदों का समय महत्वपूर्ण ना हो पर पर देश की 125 करोड़ जनता का एक एक सेकंड महत्त्व पूर्ण है जिसे आप जैसे लोग नहीं समझ रहे। आप को वहां पर समस्याओ का हल खोजने के लिए भेजा गया है पर आप की कार्यविधि देखकर लगता है आप देश के लिए खुद एक समस्या बन गए है। सुबह 11 बजे संसद का माहौल का ठीक वैसा ही रहता है जैसा हमारी गली में रात 11 बजे सारे कुत्ते एक साथ आकर भौकते रहते है बिना ये समझे की उनके भौकने से देश की आम जनता को कितनी तकलीफ हो रही है। विपक्ष के कुछ नेताओ को देख कर मुझे लडैयों सियारो की याद तक आ चुकी है जो शमशान में मृत शरीर की हड्डियों के लिए इसी तरह की चिल्लम चिल्ली करते है। आप लोगो को भी कई बार किसी की मौत को मुद्दा बनाते देखा है। आप ये क्यों भूल जाते है आप हमारे प्रतिनिधि है आप हमारी आवाज वहां पंहुचानी है लेकिन आप को तो अपनी राजनैतिक रोटियां बनानी होती है। बहुत पसंद है आप को ऐसी वेदना में डूबी हुई खून से सनी हुई,दंगो में पकी हुई, भ्रस्टाचार में चुपड़ी हुई रोटियाँ।
आज देश में परिवर्तन की नई बयार चली है पता नहीं यह अपने उद्देश्य को हासिल करेगी या नहीं ? देश का आम नागरिक परेशान है उसकी समस्या कैसे कम की जाये इस विषय पर विपक्ष के किसी नेता एक भी सुझाव या बयान नहीं दिया वल्कि सरकार की आलोचना की- जानता हूँ विरोध करना आप का काम है । आप विरोध करे पर पर तरीका ये नहीं होना चाहिए। मैंने जब सेकेंडरी स्कूल में राजनीती शास्त्र पढ़ा तो उसमे मैंने पढ़ा था किस की क्या भूमिका और कार्यक्षेत्र है। लेकिन जब आप प्रधान मंत्री जी से बात बात पर जबाब मांगते तो समझ नहीं आता की वे प्रधान मंत्री है या हल्लू के दादा। देश के किसी स्थान पर यदि कोई घटना होती और कोई व्यक्ति उस कारण से मरता है तो उसके लिए प्रधान मंत्री कैसे जिम्मेदार हो सकता है । जिम्मेदार होना चाहिए वहां के प्रशासन जन प्रतिनिधि सरपंच विधायक नगरपालिका आदि को ! लेकिन आप उन से नहीं पूछेगे क्यों उस में आप की पोल खुल जायेगी। आप के जमीनी फण्ड और सियासीचाल बाजियां वही से चलती है क्यों नहीं होती किसी जिम्मेदार पर कार्यवाही ?? आप भी राज्य सरकारों में है?
आप ने धर्म,जात, पन्त , क्षेत्र, भाषा , रंग के नाम पर इस देश को इतने हिस्से में बाँट दिया है अब खुद से संभाला नहीं जा रहा। अपने 60 वर्ष के शासन काल में आप ने इस देश को सहन करने की इतनी सहनशक्ति दी है कि अब ये आप की जहिल, गैरजिम्मेदार, अलोकतांत्रिक हरकतों को रोज सहन करता है और उफ़ तक नहीं करता। आप को संसद में भेजा गया है बहस करने के लिए आप तो उसे पता नही क्या समझ बैठे है। आप की पार्टी ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए है आप उस की नाक कटवा रहे है। और ये फर्जी समाजवादी और कम्युनिष्ट अपने महान नेताओ को लजा रहे है । आदरणीय दीदी बंगाल से भारतीय राजनीती में दो दादा रहे है और उन्होंने अपने काल में इस संसद का मान ही नहीं बढाया बल्कि गौरवान्वित भी किया। हाँ में बात कर रहा हूँ सोमनाथ दा, और प्रणव दा की , आप उनसे कुछ तो सीखिए । आप को खिसयानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचे जा रही है। और आप के भाई प्रातः स्मरणीय, चंचल , नटखट मनोहारी देश को गंभीर हास्य और खांस देने वाले आदरणीय अरविन्द जी केजरीवाल। उनके लिए एक शेर याद आता है बशीर बद्र साहब का
" अदब की हद में हूँ अब अदब नहीं होता
वो भी सुना है उसने जो मेने कहाँ नहीं "
नियम अनुसार किसी भी शासकीय या प्राइवेट कर्मचारी को वेतन तभी मिलता है जब वह कम से कम प्रतिदिन 8 घंटे कार्य करता है। यदि यह नियम संसद, विधानसभा, नगर निगम और नगर पालिका में लागू कर दिया जाये तो ?? जब तक आप 8 घंटे ऑन रिकॉर्ड कार्य नहीं करते उस दिन का वेतन भत्ते सहित काट लिए जाये। वो भी सभी का एक साथ ताकि बाकी दुसरो के कार्य में बाधा न उत्पन्न करें। निश्चित मानिये यदि ऐसा होता है तो इस देश की तस्वीर एक ही वर्ष में बदल जायेगी । आप को विरोध करना है करो सुबह से शाम तक करो लेकिन शाम से रात तक संसद चलाओ । नोट बंदी के बाद पूरा देश किसी न किसी स्तर पर परेशान है वह संसद की तरफ आशा से देख रहा है कि विपक्ष और सरकार मिलकर उनके लिए कुछ बेहतर कदम उठायेगे। पर अब इस देश की आप से उम्मीद कम हो रही है। आप सब तो बड़े नेता लोग है हमारे यहाँ छोटी सी जगह की भी यही हालत है। मुझे लगता है में भैस के आंगे बीन बजा रहा हूँ।
अभी अभी खबर मिली है कि आदरणीय जयललिता जी का लम्बी बीमारी के बाद स्वर्गवास हो गया। तमिलनाड की जनता उनको यूँ ही "अम्मा" नहीं बुलाती थी। वल्कि उनके कार्य भी एक अपने राज्य की जनता के लिए एक माँ के सामान ही थे। गरीवो के लिए भोजन सुलभ कराना आसन कार्य नहीं है। इश्वर उनकी आत्मा को शांति दें। ॐ शांति . . शांति. . शांति . . !
लिखने का मन बहुत था पर आज के लिए इतना काफी है।
आपका
अनिमेष
मुस्कुराते हुये
तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना और देखते रहना मुझे आनंदित करता है मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं और जब तुम्हारी ...
-
पिछले दिनो मेरे हाथो लगा अपने समय का सबसे विवादित और प्रतिबन्धित लेख , जिसे लिखा था स्वयं भगत सिंह ने , जेल के अंतिम दिनो मे लिखा गया यह ले...
-
तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना और देखते रहना मुझे आनंदित करता है मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं और जब तुम्हारी ...
-
परीक्षा समाप्त हो चुकी थी गर्मी का महिना और वही दादा वाली अटारी, जहाँ जाने में लोगो के पसीने छुट जाते थे वह मेरे बचपन का सबसे बहुमूल्य और आन...
