बुधवार, 7 दिसंबर 2016

सुनो सांसदों . . .

मेरे राष्ट्र के तथातथित निर्माताओ. . (मतलब राजनेताओ)
आपको सादर नमस्कार . . आप में से बहुतो की उम्र तो प्रणाम और चरणस्पर्श करने की है पर आपके कार्य और हरकते देखकर मेरा अंतरमन सिर्फ औपचारिकता पूर्ण करने के लिए नमस्कार कर रहा है।

पहले स्पस्ट कर दूँ में यानि की अनिमेष सिंघई ना पत्रकार हूँ , ना किसी पार्टी का सदस्य, और ना ही किसी संघटन का कार्यकर्त्ता। में भारतीय नागरिक हूँ जिसे संविधान के अनुसार मतदान का अधिकार है, एवं निर्वाचित प्रतिनिधि से अपनी समस्या कहने और सवाल करने का पूरा अधिकार है।

अब सुनिए . . .

पिछले दो हफ्तों से संसद में आप सब ने हंगामा मचा रखा है, दो कोड़ी का भी काम नहीं हुआ पिछले दिनों, संभव है आप 545+230 सांसदों का समय महत्वपूर्ण ना हो पर पर देश की 125 करोड़ जनता का एक एक सेकंड महत्त्व पूर्ण है जिसे आप जैसे लोग नहीं समझ रहे। आप को वहां पर समस्याओ का हल खोजने के लिए भेजा गया है पर आप की कार्यविधि देखकर लगता है आप देश के लिए खुद एक समस्या बन गए है। सुबह 11 बजे संसद का माहौल का ठीक वैसा ही रहता है जैसा हमारी गली में रात 11 बजे सारे कुत्ते एक साथ आकर भौकते रहते है बिना ये समझे की उनके भौकने से देश की आम जनता को कितनी तकलीफ हो रही है। विपक्ष के कुछ नेताओ को देख कर मुझे लडैयों सियारो की याद तक आ चुकी है जो शमशान में मृत शरीर की हड्डियों के लिए इसी तरह की चिल्लम चिल्ली करते है। आप लोगो को भी कई बार किसी की मौत को मुद्दा बनाते देखा है। आप ये क्यों भूल जाते है आप हमारे प्रतिनिधि है आप हमारी आवाज वहां पंहुचानी है लेकिन आप को तो अपनी राजनैतिक रोटियां बनानी होती है। बहुत पसंद है आप को ऐसी वेदना में डूबी हुई खून से सनी हुई,दंगो में पकी हुई, भ्रस्टाचार में चुपड़ी हुई रोटियाँ।

आज देश में परिवर्तन की नई बयार चली है पता नहीं यह अपने उद्देश्य को हासिल करेगी या नहीं ? देश का आम नागरिक परेशान है उसकी समस्या कैसे कम की जाये इस विषय पर विपक्ष के किसी नेता एक भी सुझाव या बयान नहीं दिया वल्कि सरकार की आलोचना की- जानता हूँ विरोध करना आप का काम है । आप विरोध करे पर पर तरीका ये नहीं होना चाहिए। मैंने जब सेकेंडरी स्कूल में राजनीती शास्त्र पढ़ा तो उसमे मैंने पढ़ा था किस की क्या भूमिका और कार्यक्षेत्र है। लेकिन जब आप प्रधान मंत्री जी से बात बात पर जबाब मांगते तो समझ नहीं आता की वे प्रधान मंत्री है या हल्लू के दादा। देश के किसी स्थान पर यदि कोई घटना होती और कोई व्यक्ति उस कारण से मरता है तो उसके लिए प्रधान मंत्री कैसे जिम्मेदार हो सकता है । जिम्मेदार होना चाहिए वहां के  प्रशासन जन प्रतिनिधि  सरपंच विधायक नगरपालिका आदि को ! लेकिन आप उन से नहीं पूछेगे क्यों उस में आप की पोल खुल जायेगी। आप के जमीनी फण्ड और सियासीचाल बाजियां वही से चलती है क्यों नहीं होती किसी जिम्मेदार पर कार्यवाही ?? आप भी राज्य सरकारों में है?

आप ने  धर्म,जात, पन्त , क्षेत्र, भाषा , रंग के नाम पर इस देश को इतने हिस्से में बाँट दिया है अब खुद से संभाला नहीं जा रहा। अपने 60 वर्ष के शासन काल में आप ने इस देश को सहन करने की इतनी सहनशक्ति दी है कि अब ये आप की जहिल, गैरजिम्मेदार,  अलोकतांत्रिक हरकतों को रोज सहन करता है और उफ़ तक नहीं करता। आप को संसद में भेजा गया है बहस करने के लिए आप तो उसे पता नही क्या समझ बैठे है। आप की पार्टी ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए है आप उस की नाक कटवा रहे है। और ये फर्जी समाजवादी और कम्युनिष्ट अपने महान नेताओ को लजा रहे है । आदरणीय दीदी बंगाल से भारतीय राजनीती में दो दादा रहे है और उन्होंने अपने काल में इस संसद का मान ही नहीं बढाया बल्कि गौरवान्वित भी किया। हाँ में बात कर रहा हूँ सोमनाथ दा, और प्रणव दा की , आप उनसे कुछ तो सीखिए । आप को खिसयानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचे जा रही है। और आप के भाई प्रातः स्मरणीय, चंचल , नटखट मनोहारी देश को गंभीर हास्य और खांस देने वाले आदरणीय अरविन्द जी केजरीवाल। उनके लिए एक शेर याद आता है बशीर बद्र साहब का

" अदब की हद में हूँ अब अदब नहीं होता
  वो भी सुना है उसने जो मेने कहाँ नहीं "

नियम अनुसार किसी भी शासकीय या प्राइवेट कर्मचारी को वेतन तभी मिलता है जब वह कम से कम प्रतिदिन 8 घंटे कार्य करता है। यदि यह नियम संसद, विधानसभा, नगर निगम और नगर पालिका में लागू कर दिया जाये तो ?? जब तक आप 8 घंटे ऑन रिकॉर्ड कार्य नहीं करते उस दिन का वेतन भत्ते सहित काट लिए जाये। वो भी सभी का एक साथ ताकि बाकी दुसरो के कार्य में बाधा न उत्पन्न करें। निश्चित मानिये यदि ऐसा होता है तो इस देश की तस्वीर एक ही वर्ष में बदल जायेगी । आप को विरोध करना है करो सुबह से शाम तक करो लेकिन शाम से रात तक संसद चलाओ । नोट बंदी के बाद पूरा देश किसी न किसी स्तर पर परेशान है वह संसद की तरफ आशा से देख रहा है कि विपक्ष और सरकार मिलकर उनके लिए कुछ बेहतर कदम उठायेगे। पर अब इस देश की आप से उम्मीद कम हो रही है। आप सब तो बड़े नेता लोग है हमारे यहाँ छोटी सी जगह की भी यही हालत है। मुझे लगता है में भैस के आंगे बीन बजा रहा हूँ।

अभी अभी खबर मिली है कि आदरणीय जयललिता जी का लम्बी बीमारी के बाद स्वर्गवास हो गया। तमिलनाड की जनता उनको यूँ ही "अम्मा" नहीं बुलाती थी। वल्कि उनके कार्य भी एक अपने राज्य की जनता के लिए एक माँ के सामान ही थे। गरीवो के लिए भोजन सुलभ कराना आसन कार्य नहीं है। इश्वर उनकी आत्मा को शांति दें। ॐ शांति . . शांति. . शांति . . !

लिखने का मन बहुत था पर आज के लिए इतना काफी है।

आपका
अनिमेष

सोमवार, 14 नवंबर 2016

प्रतीक्षा (गीत)

प्रतीक्षा
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ मैं समीक्षा कर रहा हूँ ।
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
सपने सारे सच हो सबके
कोई न फिर राह भटके
हो अँधेरे तो रौशनी दे
चल सके सब हौसले दें
गिरते को तुम थाम लेना
डूबते को उबार लेना
बोझ सारा बाँट लेना
मुश्किलों में साथ देना
इस प्रतीक्षा की घडी में सारे जग से लड़ रहा हूँ
मैं समीक्षा कर रहा हूँ और आगे बढ़ रहा हूँ
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
धूप हो तो छाव बनना,
बारिशो में छतरी बनना,
नींद में तुम सपने बुनना,
जागते ही साकार करना
सारे जग से प्रीत करना
सबकी सारी पीड़ाए हरना
उम्र भर को जो चाहते हो
उससे ऐसा सिलसिला रखना
इस प्रतीक्षा की घडी में खुद से ही लड़ रहा हूँ
मै समीक्षा कर रहा हूँ हाँ में तुम से बिछुड़ रहा हूँ ।
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
शब्द सारे बौने पड़ गए
अपने सारे खोने पड़ गए
जो रास्ते तुम तक थे आते
वो ही हम को आँख दिखाते
जो हवाए संदेशे थी लाती
कर ली तुम ने  कैद सारी
धड़कने है अब भी तुम्हारी
लौटकर आ जाओ साकी
इस प्रतीक्षा की घडी में आवाज तुम को दे रहा हूँ
मै उपेक्षा सह रहा हूँ  लौट आओ तुम से कह रहा हूँ
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

अतीत का पानी

पानी, जल, नीर , वारि इत्यादि इत्यादि नामो से प्रचलित जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग. आज जहाँ भी जीवन संभव है इसके बिना संभव ही नहीं है कम से कम हमारी इस धरती पर तो नहीं । आज कल वैज्ञानिक धरती के परे भी जीवन की खोज में लगे है। मंगल,चंद्रमा, वृहस्पति तो उनके पसंदीदा गृह है । आज शायद ही कोई हो जो जल के महत्त्व नहीं जानता। उसके सामर्थ्य को भी, जल के अन्दर ही वो सामर्थ्य है कि मिनटों में पूरी धरती को समाप्त कर सकता है । मरुथल को सागर और सागर को मरुथल कर सकता है । धरती पर 70% जल है फिर भी हमारे देश में अधिकांश गाँव, कस्वो, शहर , यहाँ तक कि महानगरो में भी जल की समस्या से दो चार होना पढता है । पानी की कमी से जहाँ एक ऒर किसानो की फसल पर बुरा प्रभाव पढता है तो वही दूसरी ऒर उद्योगो का विकास भी रुक रुक जाता है। जिस तरह एक राष्ट्र में एक अर्थव्यवस्था के लिए रूप रेखा (गाइड लाइन ) है वैसे ही जल व्यवस्था के लिए भी होना आव्यश्यक है और उसपर नियंत्रण भी हो ताकि वर्तमान और भविष्य के साथ आने वाली समस्या का समाधान हो सके । छोटे शहरों में हालत बहुत ही पीड़ा जनक है लोगो को 5-7 कि.मी. तक पानी लाने जाना पढता है मुझे आज भी अपना बचपन के वो दिन याद है जब गर्मी के मौसम तो छोडिये, दिसंबर की हाड कंपा देने वाली ठण्ड में भी पिता जी आधी रात में पानी लाते थे। सिर्फ पिता जी ही नहीं आस पड़ोस के सभी लोग यही करते थे। ऐसी ठण्ड जिस में लोग दिन में भी निकलने से कतराते थे उस समय आधी रात को  पानी भरना कितना कष्टप्रद था। हमारा परिवार तो छोटा था पर जिनका परिवार बड़ा था उनकी आधी से ज्यादा रात तो सिर्फ पानी ढोने में ही निकल जाती थी। साइकिल पर अपनी क्षमता के अनुसार  चार छे और आठ डिब्बे टांग कर फ़िल्टर या फिर मंडी से पानी लाना एक आम बात थी । पड़ोसियों से लड़ाई की मुख्य बजह में एक पानी ही हुआ करती थी । गर्मियों के दिनों में एक शीत युद्ध जैसा वातावरण हुआ करता था। जब नल खुलते थे तो सारी गली पानीपथ का मैदान लगती थी जहाँ हर कोई पानी के लिए मारा मारी करते रहते  थे ,  जिस दिन सुबह पानी आना होता था उस के पूर्व रात को सारे इंतजाम कर लिए जाते थे। सारे अश्त्र शश्त्र  तैयार हो जाते थे। पानी की पाइप लाइन रात को ही घर के विभिन्न हिस्सों में बिछा दी जाती थी। ताकि सुबह एक भी मिनिट और एक बूंद पानी बर्बाद ना हो, घर की हर वो छोटी से छोटी चीज जिस में पानी भरकर रखा जा सकता है भर लिया जाता था । पता नहीं होता था अब कब पानी आयेगा। गर्मी के दिनों में जब पानी की सप्लाई टैंकर से होती थी तब लोग तवे के समान तपती सडको पर नंगे पैर भागा दौड़ी करते थे और टैंकर से ऐसे चिपकते थे जैसे कोई मक्खी चासनी से चिपकती है और जब तक बूंद बूंद पानी  भी ना निकाल ले तब तक चैन नहीं लेते थे। पानी सामाजिक संघर्ष का पर्याय बन गया था। रिश्तेदारो  का आना जाना भी  पानी पर निर्भर करता था। कई रिश्तेदार तो पानी कि किल्लत के कारण भी हमारे यहाँ नहीं आते थे और हद तो तब हो जाती थी जब हम खुलकर उनको बुला भी नहीं पाते थे। जब की गर्मी से बेहाल लोग दिन में दो और तीन बार नहाते थे तब हम एक बार भी किफ़ायत से नहाया करते थे। पानी के लिए संघर्ष और समझोतो को नजदीक से देखा है लेकिन जब आज लोगो को पानी बर्बाद करते देखता हूँ तो अपना संघर्ष याद आ जाता है । मुझे आज भी याद है जब एक बार पानी भरने गया अपनी छोटी सी साईंकिल पर तो उसे कोई चोरी कर ले गया था पहली साईंकिल थी और घंटो रोया था बैठ कर । कहने को तो सिर्फ पानी था लेकिन हमारे शहर के लिए एक समस्या जिस का कोई हल नहीं दिखता था वैसे तो शहर में आधा दर्जन से अधिक छोटे बड़े तालाब थे पर, पर उनकी हालत तो हम से भी बदतर थी । हम अपना रोना तो रो भी सकते थे पर वे नहीं। दीवान जी की तलैया जल कुम्भी का शिकार थी तो ,पुरैना तला भैस आदि पालतू जानवरो की आरामगाह , बेलाताल को सूर्य की तपन सुखा देता था, तो फूटेरा तालाब सिंघाडे की खेती से ढका हुआ था । उमामिस्त्री की तलैया और कचोरा जैसे तालब मेरे जन्म से पहले ही भूमी गत हो गए थे अब ये मात्र स्थान बचे है । में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ जल का अपना महत्त्व है उसे बचा लीजिये। नहीं तो आने बाली पीड़ियो के लिए हम सिर्फ गैरजिम्मेदार अभिभावक बन कर रह जायेगे ।

गर चाहते है हम लोग जीना मुस्कुराकर
रखना पड़ेगा पानी बचा बचा कर ।।

आपका
अनिमेष

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

गोल्डन पल (कहानी)

अमीष ने अभी अभी फिर खुद को समझा बुझा कर अपने आप को तस्सली दी थी। पर जिन्दगी कहाँ चैन से जीने देती है एक बार फिर इतिहास उसके वर्तमान में भविष्य के लिया बाधा बनकर खड़ा था । हाँ खड़ी थी वो लड़की जिसे कभी वह अपना भविष्य बनाना चाहता था शायद आज भी बनाना चाहता है . ! पिछले कई महीनो से उससे कुछ मिनिट उस उधार मांग मांग कर उसका गला कुछ बैठ सा गया था जुबान समय पर पलटती ही नहीं थी. .जब वो सालो बाद मिलकर बोली बोल दो जो बोलना है तब उसका  दिमाग इस गुणा भाग में लग गया  कि कही कोई बात उसको लग ना जाए । कितनी शिकायते थी उसे उससे । जब संगती ने उससे कहा की कैसे बीत गए इतने साल कुछ पता ही नहीं चला , तब जबाब में अमीष की जुबान बिना कुछ सोचे कैची की तरह खच से चली, उसकी बात काटी और दुबक गई. बस उसने  इतना ही कहाँ जब साथ हमसफ़र हो तो सफर का पता नहीं चलता और तन्हाईयो में एक पल भी सदियों की तरह गुजरता है। मुझे आज भी याद है जब पहली बार उसे दूसरी मंजिल की पहली सीडी पर भागते हुए मिली थी और फिजिक्स वाले श्रीवास्तव जी को पूछ रही थी उसने भी इनकार में सिर हिला कर असहमति जता दी थी वो थी उसकी पहली पहचान मुलाकात । उसके बाद वे दोनों  मिले उस कार्यक्रम में जिसने पुरे देश को जोड़ कर रखा था दामिनी दुष्कर्म के विरोध में चल रहे एक आन्दोलन में  . . जिस में तब अमीष ने  माइक संभाला हुआ था और दुष्यत जी की गजल से अपने वक्तव्य का समापन किया था।
पंक्तिया थी. . .
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए.
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
शायद ये पंक्तिया संगती को पसंद आ गई थी उसने ऐसा अमीष से कहा । शायद सच यह था कि पसंद आ गया था अमीष  । बाद में अगले दिन वो उन लाइनो को लिखवाने के बहाने उसे ढूढ़ते हुए उसके  पास चली गई थी, कुछ एक दो फॉर्मल टाइप के सवाल जबाब के बीच अमीष ने उसे कविता लिखवा दी।  उसके बाद कुछ महीनो तक जब भी वे  जहाँ भी टकराते , दिखते, मिलते, तो एक सुन्दर सी मुस्कान के साथ हम एक दुसरे को इस बात का एहसास दिलाते कि हम अभी भी एक दुसरे को भूले नहीं है, और न अमीष उसे भुलाना चाहता था।।
फिर एक दिन वह कंप्यूटर लैब में संयोग से उसके बाजू में आकर बैठ गई थी । उसके बाद उन दोनों के बीच  जो बातो का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा लगा जैसे समय उन से जल कर जल्दी जल्दी भागने लगा है घंटे तो मिनटों में कटने लगे। पता भी नहीं चला कब लैब का समय ख़त्म हो गया था उसे समझ नहीं आ रहा था साधारण सी दिख़ने वाली उस आसाधारण लड़की में ऐसा क्या था जिसे पिछले 22 सालो  में पहली बार खयालो से मिटा नहीं पा रहा था अगले दिन का इंतज़ार कभी भी इतनी बेसब्री से नहीं किया था । तब भी नहीं जब उसे नई मोटर साइकिल मिलने वाली थी और तब भी नहीं जब उसका चार साल बाद  जन्म दिन आने वाला था। इस तरह मिलने का सिलसिला कुछ दिनो तक यूँ ही चलता रहा।  फिर जब उनको लगने लगा उनका  इसतरह मिलना बाकि लोगो को खलने लगा है तब उन्होंने बात करना शुरू  किया मोबाइल पर और मिलना लाइब्रेरी में लेकिन दुनिया की नजर में वे अभी भी अजनबियों से कम नहीं थे।
सुबह उठकर उसकी पहली कोशिश होती थी की बस एक बार संगती दिख जाए और जिस दिन रविवार होता तो दिन भर यही लगता किं शहर में कहीं टकरा जाए ,एक झलक मिल जाये बस। ऐसा होता भी कि अक्सर नजदीक की डेली नीड्स शॉप पर वह उसे मिल ही जाती थी। अभी तक उन्होंने एक दुसरे को अपने जज्बातो के बारे में बताया तो कुछ भी नहीं था पर ऐसा भी नहीं था वे दोनों कुछ समझ भी नहीं रहे थे  संगती भी ये समझती थी अमीष को कहना क्या है और शायद अमीष भी पर आखिर कहे कौन?? अमीष की आँखे उसे सिर्फ देखती ही नहीं थी वल्कि कुछ बोलती भी थी जिसे संगती समझ जाती थी । पर संगती कि किसी सहेली ने उसके मन में ये बात भर के रखी थी कि "लड़के लडकियों को धोखा देते है सब लड़के एक जैसे होते है पहले प्यार का नाटक करते है फिर ब्लैक मेल टाइप " ये बात हमेशा अमीष  सामने एक चुनोती रही और इसी कारण वो आज भी शायद अमीष पर उतना भरोसा नहीं करती जितना वह उससे प्यार करता है । पर बो दिन आ ही गया जब पूरा आसमान रंगीन पतंगों भरा था और शहर की गलियों में घुली थी गुड और तिल की सौंधी महक, अमीष को पता नहीं था गुड की मिठास आज उसकी  जिन्दगी में मिठास भरने वाली थी आज उसके जीवन का प्रेम रूपी सूरज उत्रायण में प्रवेश करने वाला था। वह संगती का  इन्तजार  लाइब्रेरी में कर रहा था जब वो आई तो उसके दिल की धड़कन नियंत्रण से बहार हो गई उसे  ऐसा लग रहा था जैसे दिल शरीर के बाहर धड़क रहा है और चारो तरफ मधुकामनी और हर श्रृंगार की मादक महक फैली हो. कोई मधुर संगीत बज रहा हो। उसको देखकर उसका  चेहरा कुछ ऐसे खिल गया जैसे सूर्य की पहली किरण के साथ कमल खिल जाता है ख़ुशी इतनी कि जैसे कि चाँद को देखकर चकोर और बारिश की पहली बूंद में पपीहा खुश हो जाता है । लाइब्रेरी में अन्दर जाते ही अमीष और संगती दुसरे की तरफ पीठ कर के खड़े थे अलमारी में किताबों को  देखने का दिखावा करने के लिए क्यों किसी को  समझ नहीं आ रहा था बात कहाँ से शुरू  करें  और कौन सी ? संगती  भी सोच रही होगी कैसा बुद्धू लड़का है बात करना भी नहीं आता इसे तो और जब देखो तब बड़ी बड़ी बाते करता है । अमीष की यही तो कमजोरी रही है जब वो सामने आती थी तो भूल जाता था क्या बात करना है और जब फुर्सत होता यही सोचता रहता की क्या क्या बात करनी है । फिर संगती ने  ही ख़ामोशी को तोड़ते हुए बोला. .  ऐसा क्यों होता ??? अमीष ने भी कुछ चुने हुए शब्दों में कहाँ बस हो जाता है जिस से होना होता है  . . !
पर क्या . . . ?? ये बोलने की जरुरत न संगती को थी न अमीष को। फिर थोड़ी देर उनदोनो ने यहाँ वहां की बाते कीं। लौटते समय जब संगती ने अपनी गर्म हथेली अमीष  के ठन्डे पंजे सेे हांथ मिलाने को आंगे की  तो  अमीष ने उसे कुछ ऐसे थाम लिया जिसे उसे कभी भी न छोड़ना चाहता हो और न ही संगती ने उससे छुड़ाने का प्रयास किया। बस यूँ ही कुछ देर थामे रहे वे एक दुसरे का हाँथ ऐसा लग रहा था जैसे फीलिग्स का डाटा हैण्ड टू हैण्ड ट्रान्सफर हो रहा है वैसे अमीष उसे जाने तो नहीं देना चाहता था पर समय की अपनी सीमा है और फिर संगती घर चली गई ।
अमीष उन पलो को महसूस करते हुए मन ही मन खुश होंते हुए  थोडी देर बाद घर चला गया उसने घर जा कर देखा तो, मोबाइल में उसके लिए संगती के कुछ मैसेज थे जिसमे उसने  पुछा था कि अमीष उससे क्या कहना चाहता है ? संगती ने लिखा कि मुझे आज ऐसा लगा आप कुछ बोलना चाहते हो और बोल नहीं रहे. . . . . बोलो ना क्या बोलना है ? थोड़ी देर आना कानी के बाद दुनिया के सबसे खूबसूरत और वेश कीमती शब्द जो आज तक शायद अमीष ने  उसके लिए ही बचा कर रखे थे बोल ही दिए  . . .  ! एक दम सन्नाटा सा छा गया । अमीष का मैसेजे पढने के घंटे भर तक कोई जबाब नहीं आया । तब तक उसका मन इतना व्याकुल इतना घबरा गया कि कहीं उसने बोल कर गलती तो नहीं कि . .! एक अच्छा दोस्त तो नहीं खो दिया, क्या सोच रही होगी संगती मेरे वारे में ?? इसी उधेड़ बुन में बीता एक घंटे का समय न खाने का होश न समय का ध्यान।
फिर उसने पुरे 72 मि. बाद संगती ने अमीष से पुछा "ऐसा क्या है जो आप मुझे इतना पसंद करते हो ?
फिर अमीष ने  थोड़ी देर का समय माँगा और बोला 10 मिनिट बाद बताता  हूँ और वो समझ गई कि उसको कोई ख़ास उत्तर अमीष के अपने ख़ास  अपने अंदाज़ में मिलेगा
फिर अमीष ने एक टूटी फूटी कविता में अपना जबाब लिखा-

संभव है तुम्हारी आंखे सुंदर ना हो.  पर मुझे तुम्हारा नजरिया पसंद है . .
संभव है तुम्हारी आवाज सुरीली ना हो. पर मुझे तुम्हारे गीत  पसंद है . .
संभव है तुम्हारी बात पसंद ना हो . पर तुम से बात करना बहुत पसंद है . .
तुम्हे लिखना पसंद नही . .पर तुम्हारी लिखावट बहुत पसंद है .  .
तुमसे हमेशा मिलना संभव नही ..  पर तुम्हे देखना पसंद है . .
तुम व्यस्त बहुत हो. .पर व्यवस्थित हो. .मुझे यह भी बहुत पसंद है
तुम्हारा हसना, बोलना , देखना , दिखना  , मुस्कुरना , बाते करना , मिलना, टोकना, रोकना, पूछना, बताना, सब पसंद है . .

आज से दो दोस्त -प्रेमी हो चुके थे  पर बिडम्बना तो देखिये वे दोनों दिन भर एक ही जगह होने के बाद मिल नहीं सकते थे बात नहीं कर सकते थे दुरी भी सिर्फ ग्राउंड फ्लोर से सेकंड फ्लोर तक । बस देख सकते कैंटीन में और आते जाते। संगती को शायद यह पता ही नहीं हो कि गुप्ता जी की कैंटीन में 9 बजे अमीष चाय पीने नहीं बल्कि सिर्फ उसे देखने ही जाता था चाय तो सिर्फ एक बहाना था असल मकसद तो कुछ और ही था। अमीष का  दिन तो सिर्फ संगती मुस्कराहट भर से कट जाता था और जब तक उसको देख न लो मन को चैन नहीं मिलता था। उठ तो 7 बजे जाता था लेकिन जागता था 9 बजे संगती को देखने के बाद। पर उनकी तकदीर को कुछ और ही मजूर था। 
इजहार ये मोह्हबत के ठीक 15 दिन बाद जब पूरी धरा पर बसंत छाया हुआ था प्रकृति अपनी सुन्दरता लुटा रही थी तब उसने अमीष को  आने वाले  पतझर की झलक दिखाई उन 15 दिनों में एक पूरी जिन्दगी जी थी अमीष ने । कभी किसी सड़क किनारे गुपचुप तरीके से गुपचुप (पानी पूरी) खाना, या संगती के टिफिन को सब से छुप कर खाना, एक बार जब वो मटर पुलाव लाई थी तो अमीष ने सब से छुपकर खाया और आज भी अक्सर याद करता है वो स्वाद। एक बार जब संगती से  मिलने नीचे शॉप पर गया तो वो कुछ घर के लिए जरुरी सब्जी फल ले रही थी उसने अमीष के लिए एक पपीता भी ले कर रखा था जब अमीष ने लेने से मना किया तो प्रेम और अधिकार से उसके हाँथ रखकरचली गई वो भी अपनी अमिट मुस्कान के साथ . जब भी बाजार में पपीते को देखता होगा तो उसको वे पल याद आ ही जाते होंगे उस पपीते का पीला पन आज भी अमीष के चेहरे पर उतर आता है उसे याद आ जाती है पपीता लिए अल्हड लड़की,  कुछ इस तरह बढ़ रही थी अमीष-संगती कहानी लेकिन  पूर्णिमा का चाँद अब अमावश्या की और बढ़ गया था वो भी ऐसी अमावशी काली रात जिसने ना तो सूरत को निकलने दिया ना फिर अमीष को चैन से सोने।
एक शाम को अमिष और संगती लाइब्रेरी में मिलने बाले थे पर संगती को देर हो गई और उन दोनों ने अपना मिलना तय किया संगती के घर के पास पानी पूरी के ठेले पर, तब संगती ने अमीष को बताया कि अव उसकी शादी कि बात होने लगी है और मम्मी पापा लड़का देखने गए है। देर हो रही थी इसलिए वे अगले दिन दोपहर में मिलने का तय करके चले गए। लेकिन अमीष का मन बहुत वेचैन था वे देर रात तक टेक्स्टिंग करते रहे अमीष उसे वो अमीष को समझाते रहे। पर सुबह सुबह ही संगती अचानक उसे मिलने को बुलाया लेकिन जब अमीष गया तो किसी बात पर वह उससे गुस्सा होकर बोला " तुम्हे जिस चीज से बचाना चाहो तुम वही करती हो " ये बात शायद संगती चुभ गई।वे दोनों वहां से चले गए लेकिन जब शाम को अमीष ने संगती को कॉल किया तो रेसिव नहीं किया, कई बार किया, वो उसके मैसेज का भी जबाब नहीं दे रही थी उसके 22 कॉल और 14 मैसेज किये अपना पूरा हाल सुना डाला। संगती ने सिर्फ एक मैसेज किया और लिखा अब हम कभी बात नहीं करेगे ,न बात करेगे न मिलने की इक्षा होगी ।अमीष बेसुध सा बैठा ट्रेन का इंतज़ार करता रहा, उसे उस दिन घर जो जाना था। बहुत लम्बी रात थी ये अमीष के लिए। अगले दिन सुबह संगती का फ़ोन कॉल आया और बोली मै आप से गुस्सा नहीं हूँ बस आप को थोड़ा परेशान करना था। तब जा अमीष थोडा ठीक हुआ। एक बात सच बोली थी संगती ने की वो कभी बात नहीं करेगी,उसने की भी नहीं । क्यों कि उस दिन उसकी शादी तय हो चुकी थी उसके बाद उन दोनो ने एक आखरी बार मिलने का तय किया। लेकिन वे फिर कभी नहीं मिल सके,हमारे सामाजिक पैबंद फिर से उनके प्रेम के बीच अद्रश्य दीवार बन कर खडे थे। आखरी बार मिल के जो कहना था उसे वो अब भी बाकी है। मुझे आज भी आश्चर्य है कि कोई एक दिन सिर्फ एक दिन में इतना कैसे बदल सकता है। क्या उसको कभी भी याद नहीं आती होगी ? कोई भी रिश्ता एक दिन में ख़त्म हो सकता है ? कुछ ही दिनों में दो अच्छे दोस्त अजनबियों में बदल गए । मैंने उसको कई दफा आमने सामने गुजरते देखा पर उन्होंने कभी नजरे नहीं मिलाई। पहले कभी उसी बिल्डिंग में मिलनेके बहाने खोजते थे और आज एक दुसरे से भागते फिरते है । लेकिन उनके मन आज भी एक है शायद इसलिए एक दुसरे को पर्याप्त स्थान दिया है । किसी को किसी से कोई शिकवा नहीं अमीष संगती की यादो में आज भी मशगूल है। एक दिन गलती से ही सही संगती से अमिश को कॉल लग गया। फिर वही समस्या कि बोले कौन और क्या ? वक़्त ने फिर खुद को दोहराया फिर वही दिन आया जब पहली बार मिले थे वे दोनों और इस बार भी उसी दिन मिले पर फर्क सिर्फ इतना था कि उस दिन मिले तो मिलते गए और अबकी बार मिले तो फिर कभी न मिलने के लिए ।।
उसने जाते जाते अमीष से कहा कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा पर इतने सालो में कुछ भी ठीक नहीं हुआ। कोई एक दिन नहीं जब वो उसे याद नहीं आती। सोचता है कि वो उसको भूल जाये। पर ऐसा कर नहीं पाता। उसके न भूलने पर मेरी एक कविता

फिर उसको भुलाने बैठे फिर उसी की याद आई ।।
वैसे तो तस्वीरे सारी मिटा के गई थी,
फिर ना जाने वो आँखों में कहा से उतर आई ।।
कुछ ख्वाब अब भी उसके बिना अधूरे है,
न जाने वो नीदें चुरा कर कहा रख आई ।।
एक रोज शाम को उसने कहा गलत है ये,
ना जाने क्यों मेरी आँखे भर आई ।।
नज़रे मिला के मिलती थी जो मुझ से,
ना जाने नज़रे चुराना कहां  से सीख आई ।।
वो जो नूर थी कभी मेरे चेहरे का,
आखरी बार मिलके सारी रंगत लूट लाई ।।
अव कहाँ वो मुझ से मिलती जुलती है,
सारे बहाने मिलने के दरिया में फेक आई ।।
द्वारा :-
अनिमेष सिंघई

रविवार, 7 अगस्त 2016

रिश्तो के ऊष्मागातीकीय नियम

प्रथम नियम

विज्ञान कहता है जहाँ,प्रकाश है वहां ऊष्मा है
जहाँ ऊष्मा है वहाँ ऊर्जा है
वह ऊर्जा जो नष्ट नहीं होती
वह ऊर्जा जो सिर्फ रूप बदलती
ठीक हमारे रिश्तो की तरह
थोड़े से प्रकाश और ऊष्मा से
फल फूल जाते है
लेकिन जैसे ही
रूप बदलते है टूट जाते है
क्या ऊष्मा और प्रकाश उर्जा नहीं है ?
और यदि यह उर्जा है तो
रिश्ते अपना रूप बदले
रंग बदले और स्वाभाव भी
पर रहे ठीक  उर्जा के
प्रथम नियम की तरह ।।

शून्य नियम

यदि कोई दो पदार्थ
किसी तीसरे के साथ
एक सामान तापमान पर है
अतः वे आपस में
एक समान उष्मीय व्यवहार करेंगे
ठीक हमारे  रिश्तो की तरह
जैसे  दो एक समान  सोच विचार शौक
रहन सहन वाले  व्यक्ति मित्र बनते हैं
और अन्य  भी शीघ्र
उनके प्रभाव  में आ जाते हैं
एक रूप एक स्वाभाव और
सामाजिक साम्य स्थापित करते है
ये रिश्तो का शून्य नियम है।

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

गुरुणां गुरु

परीक्षा समाप्त हो चुकी थी गर्मी का महिना और वही दादा वाली अटारी, जहाँ जाने में लोगो के पसीने छुट जाते थे वह मेरे बचपन का सबसे बहुमूल्य और आनंददायक स्थान था, जहां बचपन के सबसे खुबसूरत और यादगार दिन बीते, वह अटारी जिस के दरवाजे से दिखता था गजानन टेकरी पर स्थित संतोषी माता का मंदिर और वो जमीन से लगी छोटी खिड़की जो पूरी गली का व्यू पॉइंट था एक दीवार पर  टंगी सूर्योदय वाली पेंटिंग जिसे गुडिया बुआ ने बनाया था दादा के जाने के बाद भी अटारी अभी भी जस की तस थी।  सलीके से जमी हुई अलमारी वह डेस्क जिस पर वे अक्सर अपना काम किया करते थे अब भी पलंग के आगे रखी हुई थी उनका वह ऐश ट्रे जिसे मैंने कब का पेन स्टैंड बना दिया था । कभी कभी लगता था दादा अभी  कही से  आ जायेगे पर ऐसा कभी नहीं हुआ। धर्म के नाम पर सिर्फ बाई(दादी) और मम्मी के कहने पर मंदिर जाना और बचपन में दादा द्वारा सुनाई और सुनी हुई प्रार्थना जिसे अब में भूलता जा रहा था या भूल ही चूका था पहले हर शाम वे राजा राणा और प्रभु पतित पावन वाली बिनती लाइट जाने पर सुनते थे । उनके बीमार हो जाने के बाद किसी ने ना सुनी । उस दिन घर पर बहुत बोर हो रहा था वो भी गर्मी की दोपहर का समय था मैं घर पर ही खुरापात कर रहा था तो आचानक अटारी पर जीने से लगी हुई अलमारी के पास कुछ छुपा रहा था तो मुझे मिली एक किताब जिसका शीर्षक था "अपना घर" उसके रचियता थे 'मुनि श्री क्षमासागर जी' एक आकर्षण जागा उस किताब का कवर पेज देख कर तीन उर्ध्वाधर पत्थर जो आपस में जुड़े थे और आकाश की तरफ निहार रहे थे उसे फ़ौरन हाँथ में लिया और पलटना शुरू कर दिया वैसे तो उसमे लगभग 65-70 कविताय होगी पर सबसे पहले पढ़ी "अपना घर" उसके बाद ना जाने वह किताब कब की पढ़ के पूरी हो गई लेकिन अब प्यास और भी बढ़ गई थी.। तो फिर पहुच गया उसी अलमारी के पास, ढूढने लगा,क्षमा सागर जी की कोई और पुस्तक "मुझे तब नहीं पता था कि गुरु मिल गए है और मैं गुरु के गुरु की तलाश कर रहा हूँ " फिर मुझे मिली एक और किताब "आत्मअन्वेशी" जिसे भी लिखा था मुनि श्री क्षमासागर जी ने । इस का कवर तो उससे भी लाख गुना आकर्षक था- आचार्य श्री विद्यासागर जी अपनी चिरयुवा तेजमयी मुद्रा में मुस्कुरा रहे थे वह कोई कविता की किताब नहीं वह थी संस्मरण और आचार्य श्री के  जीवन पर आधारित किताब जो आज तक मुझे आधार दिए हुए है जिस ने मुझे भटकने नहीं दिया । मैंने उनको सैकड़ो बार तो पढ़ा होगा पर अभी भी अनपढी सी लगती है । ये दोनों मेरे जीवन के वह गुरु है जिन से मैंने कभी एक शब्द, शब्द क्या अक्षर के बराबर भी बात नहीं की पर
जब भी वह बोलते है तो लगता है जैसे कोई अमृत के घट मेरे कानो में उड़ेल रहा हो । कविताओ को पढो तो लगता है जैसे जीवन दर्शन स्वयं छलक-२ के आंगे आ रहा हो । कुछ कविताय आप के लिए

# और और अपना #

जिसे पाकर लगे
कि अपने को
पा लिया
समझना वह
अपना है
और जिसे पाकर लगे
अपने को
खो दिया समझाना
वह और भी अपना है ।।1।।

जितनी दूर
देखता हूँ
उतनी रिक्तता पाता हूँ
जितने निकट
आता हूँ
उतना ही
भर जाता हूँ ।।2।।

*कभी ऐसा हो*

कभी ऐसा हो
कि देने का मन हो
और लेने वाला
करीब न हो
कभी हम
कुछ कहना चाहे
और सुनने वाला
कोई करीब न हो
तब यह्सास होता है
कि देने और सुनाने वाले से
लेने और सुनने वाला
ज्यादा कीमती है ।।3।।

ये सब तो केवल बानगी है पूरा सागर का सागर है गुरुवर ! और गुरुणां गुरु का तो क्या कहना ।

वैसे तो अभी तक जो भी मिला कुछ न कुछ सीखा कर गया इस लिहाज से सब मेरे गुरु हुए, पर जिन्होंने मुझे इस योग्य बनाया की में सीख सकू उनको सादर प्रणाम ।।  हर वह कठिन समस्या जो मेरे सामने आई जिस को अपने प्रयास से  हल किया है वह स्वयं मेरा गुरुकुल है,  हम जीवन भर शिष्य बने रहे यही गुरु से कामना है । मेरे अन्दर की सारी अच्छाई मेरे गुरुओ की और कमिया मेरी अपनी ।।

आपका
अनिमेष

रविवार, 1 मई 2016

ख़ामोशी . . .

एक क्लास में टीचर ना हो और स्टूडेंट शांत हो, एक मैदान में रोमांचक खेल चल रहा हो और दर्शक चुपचाप बैठे हो,  कितनी उलटी बात कर रहा हूँ मैं । भला ऐसा भी होता है कभी,वैसे भी कौन चुप रहता है आज कल सब के पास कुछ ना कुछ कहने के लिए बोलने के लिए बताने के लिए साझा करने के लिए है  और ऊपर  माध्यम भी बहुत है, कहने को दोस्तों की कमी भी नहीं है हर बात हर पल यहाँ से वहा, वहा से यहाँ होती ही रहती है
पर कुछ एक लोग आप को मिलेगे खामोश रहने वाले। कहकर भी कुछ ना कहने वाले, सोचने ज्यादा और बोलने कम वाले, ना किसी से शिकवा , ना किसी से होड़, उनकी अपनी जिन्दगी और अपनी अपनी दौड़ ।
इनके पास बोलने के लिए बहुत कुछ है पर वे अक्सर इस बजह से अनकहे रह जाते है कि उनकी बात समझेगा कौन ? ख़ामोशी इनकी ताक़त भी है और कमजोरी भी। रास्ता भी है और मंजिल भी है । क्यों की ये लोग तथ्यों को इतनी बारीकी से अध्यन कर के वैठे होते है की कोई इनको जरा भी उकसा दे तो, किसी विस्फोटक की तरह अपना रुख अख्तियार कर लेते है विचारो का एक गहरा समुन्दर इनके अन्दर तक पसरा रहता है एवं देश की समकालीन घटनाये जो की व्यक्तिगत हो या सामाजिक इनके अन्दर किसी सरिता की तरह प्रवेश कर एक नवीन मुहाना बनाती है और उस पर होती है तर्क और वितर्क की खेती बिना किसी उर्बरक और कीटनाशक के । पर इसका पता कोई नहीं लगा सकता की फसल कौन  और कब कटेगा। यह वह फसल  है जो सदा हरी भरी रहती है भले ही जीवन कितना भी नीरस हो या सरस, अंधकार में हो या प्रकाश में, ढलान पर हो या चढाव पर , विचारो का खेत सदा लहलहाता है चाहे वह कैसे भी हो,  सकारात्मक या नकारात्मक विचार तो आने ही आने है कुछ लोग व्यक्त कर देते है कुछ बचा कर रखते है समय पर बोलने के लिए और समय कभी नहीं आता । और हम जैसे लोग अनकहे या खामोश रह जाते है, कई बार खामोश सिर्फ इसलिए रहते है कि जो कुछ कहेगे वह जी का जंजाल बन जायेगा खुद के लिए भी और दूसरो के लिए भी। इसलिए बेहतर है ख़ामोशी ।

अक्सर लोग ख़ामोशी को कमजोरी समझ लेते है, पर  वही ताक़त का संचय कर के बैठी है, और आप उसके कृपा पात्र है ना जाने कब ख़ामोशी का एक दुबका सा शब्द उछल कर हलचल मचा दे। जिन्दगी से नाखुश लोग ख़ामोशी का दामन थाम लेते है और निर्दोष भाव से चुपचाप अपने आप को संलग्न कर देते है।खुश मिजाज लोग भी अपनी मन को बात बताने में चुप ही हो जाते है ।
आस पास के लोग ऐसे लोगो का मजाक बना देते है वे उन्हें परेशां करने का, नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और ना जाने कितने प्रकार के मानसिक दर्द उस व्यक्ति को सहन करना पड़ते है जबकि वह खामोश सिर्फ इसलिए है के उसके आस पास के लोग शांति और सुख से रह सके पर उनकी यह बात समझने वाला कोई नहीं।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह बोलता है की जब भी मेरे पास बोलने के लिए बहुत कुछ होता है तब में खामोश हो जाता हूँ। किस से कहू ?क्या कहू?  और कितना ?
घर से दूर अनजानो में अपनो  की तलाश, पतझर में बसंत के सपनो की तरह है ।।

एक छोटी रचना शीर्षक है
               

                             ख़ामोशी

जिन्दगी हर एक कदम पर ख़ामोशी का इम्तेहान लेती है ।
वो ये देखती है कि ख़ामोशी आखिर कब तक चुप रहती है ।।

ख़ामोशी कितने दर्द सहन कर लेती है ।
बिना बोले सब अपने अन्दर समेट लेती है ।।

फिर भी ख़ामोशी से दर्द का हिसाब चिल्ला चिल्ला कर माँगा जाता है ।
उसके शांत रहने का मखोल उड़ाया जाता है ।।

जिस दिन भी ख़ामोशी एक शब्द भी आंगे आकर बोलेगी ।
ना जाने कितने घर की दीवारे डोलेगी ।।

ख़ामोशी उफनती नदियाँ नहीं समंदर है ।
हजारो नदियाँ जिस के अन्दर है ।।

जब मैं कुछ कह नहीं पाया,
ख़ामोशी को शब्द बना डाला ।
चीखने लगा कलम से कागज पर,
पत्थर धरा रह गया मेरे साहस पर । ।

आपका
अनिमेष

रविवार, 3 अप्रैल 2016

जमीन से जुडा भारत

जो कुछ भी आगे लिखने जा रहा हूँ वो ना तो गर्व करने लायक है वल्कि समाज,सरकार, और इंसानियत पर ठोस तमाचा है. जो तस्वीर में बयान करने जा रहा हूँ वह  वापी रेलवे  स्टेशन की है वापी एक ऐसा शहर जिसके चारो तरफ उद्योगों का जाल नहीं बल्कि जंजाल है। ट्रांसपोटरों का सबसे बड़ा आड्डा है पुरे देश के लोग पैसा कमाने आते है। आप को सुनाता हूँ आँखों देखा हाल समय था लगभग शाम के ५ बज रहे थे और और टिकिट खिड़की पर भीड़ भी बढती जा रही में भी पंक्ति में खड़ा खड़ा जो कुछ देख तो रहा था बह मुझे अन्दर तक झकझोर गया। एक 4 साल का छोटा बच्चा बंद खिड़की के पास निचे की तरफ एक ब्रैड(डबल रोटी) का पैकेट और एक में सब्जी का पैकेट लिए बैठा था और अनुमान के हिसाब से उसने वह सब भीख से आये रुपयों से ख़रीदा होगा। शरीर पर सिर्फ एक आधा फटा टी-शर्ट और आँखों में शायद किसी का इंतजार और देखते ही देखते एक लगभग 6 वर्ष की एक लड़की अपने साथ 2वर्ष की एक और लडकी को गोद में लेकर आई और उससे कुछ बोला और कतार में लगे लोगो से भीख मांगने लगी इस बीच वह 4 साल का बालक ब्रैड और सब्जी को खाने लगा। पहले उसने एक एक करके ब्रैड  जमीन पर निकाले फिर एक पालीथीन के एक छोटे से पैकेट पर सब्जी निकाली और उसमे से थोड़ी सी सब्जी जमीन पर भी आ गई। और वह उसे बिना किसी बात का संकोच किये बिना खाने लगा ।जमीन पर ब्रैड जमीन पर सब्जी एक स्टेशन पर टिकट खिड़की के पास की जमीन जिस पर दिनभर में कितने लोग आय होंगे और हम अपने बच्चो को सीखाते है जमीन पर गिरी हुई चीज़ नहीं खाना खाना चाहिए तो फिर ये बच्चा किसका है इसे कोन बताएगा । कहा है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ,रोटरी क्लब , लायंस क्लब , NGOs ,कॉरपोरेट्स की सामाजिक जिम्मेदारी का २% और सबसे महत्वपूर्ण मानवता,इंसानियत ।

।एक बार मन में बिचार आया की तस्बीर निकालकर तुरतं प्रधानमंत्री को दिखाऊ उन्होंने कहा था  आप अपने आस पास के दुर्लभ चित्रों को मेरे साथ साझा करे,(इससे दुर्लभ क्या होगा ?) इससे भारत में पर्यटन उद्योग का विस्तार होगा, पर हिम्मत नहीं कर पाया में किसी ऐसी और मर्मस्पर्शी चीज़ को बिस्तार नहीं देना चाहता जो किसी के मनोरंजन का कारन बने जो आज कल प्रचलन में है । लोग सोशल मीडिया पर किसी बात को साझा करना भर अपनी जिम्मेदारी समझ कर बैठे है। एयर कंडीशंड हॉल में बैठ कर गर्मी की बाते करना बहुत आसन है पर मई की गर्मी में खेत तैयार करना अलग बात है ठीक वही  बात यहाँ लागु होती है  और सबसे बेहतर काम है वाटसअप पर विचारो के गरम गरम पकोड़े , बड़ा पाव ,समोसा(अपने स्वाद अनुसार ) तलो और दिनभर बाटते रहो। सबसे आननद का काम है मस्त रहो मस्ती में ।  बहुत गर्व महसूस होता जब रतन टाटा का रेस्तोरेस्ट वाला अनुभव साझा करते है पर उससे सीखते कुछ भी नहीं,रत्ती भर भी नहीं ।
रात को महाराष्ट्र के सूखे और पानी पर बड़ा सा सन्देश भेजेगे और सुबह से वही घोडा वही मैदान,रात गई बात गई। ये भारत है जी भारत । इंडिया वालो को इससे क्या? कोई भूखा रहे या प्यासा , पेट भर अनाज हो या ना हो, तन ढकने के लिए कपडे, और पता नहीं क्या क्या नहीं है इंडिया वाले भारत में ?
लेकिन हम इनके लिए नहीं लड़ेगे हम लड़ेगे पाकिस्तान से मोदी से,केजरीवाल से,ओबीसी से ,आरक्षण से ,जाटो से। तथा तथित बुद्धिजीवी लोगो को देश में असहिष्णुता नजर आती है पर गरीवी और भूख नहीं ,कभी देश के भूखे और गरीब लोगो के लिये संसद भंग होते नहीं देखी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और और मुंबई से मेघालय तक पुरे देश का यही हाल है। कुछ प्रान्तों में हालत इससे भी बदतर है फिर भी हम लड़ेगे भाषा पर , भारत माता पर , भागवत पर । कांग्रेस मैया की सरकार हो, या भा ज प भैया की या फिर लिट्टे चोखा की गठबंधन सरकार, बुआ और भतीजे की सरकार या लाल सलाम सब यही चाहते है देश की आधी आबादी भूखी नंगी अशिक्षित रहे ताकि हर पांच साल बाद इनको एक दारु की बोतल चंद गुलाबी कागज और कुछ मुंगेरी लाल के हसीन सपने थमा कर सत्ता रूपी रूपसी का भोग करते रहे और बोलते रहे भारत माता की जय । । हमारा समाज भी कहाँ चाहता है बदलना जिसे मौका मिलता है लग जाता है शोषित का शोषण करने, जो अधीन है वह अधीन ही रहे समानता प्राप्त ना करे। यह भारतीय मानसिकता का विशेष लक्षण है। में कितने लम्बे समय से इस बात का अनुभव करता रहा हु कल एक छोटे से बालक ने वो सब कुछ सोचने पर विवश कर दिया लिखने को बहुत है पर सच लिखने की जबाबदारी है कुछ पंक्तिया याद आ गई तो आप से साझा करता हूँ

"जब आँख खुली तो देखा यह
शोषित पीड़ित ही भरे पड़े है
जगती के बिस्तृत प्रांगण में
अधिकांश जनो की कुटिया पर
अधिकार जमाए है कंगाली
जिन की निधि की सूची यह है
टूटी हडिया फूटी थाली
धुत्कारे खा कर जीते है
आंशु पी कर रहते है
ऐसे दीनो की आंहे तुम तक
पहुचाने आया हूँ
करुणा का कवि हूँ
कण कण में करुणा बिखराने आया हूँ "
(धन्य कुमार जी सुदेश )

वहां पर लगभग 200 और लोग होगे पर किसी का मन ना पसीजा शायद ये उनके लिए आम बात होगी या फिर फर्क होगा द्रष्टिकोण का या फिर वो ये सोचते होगे की ये भी कोई ढोग ही होगा या नज़र नहीं गई होगी कुछ भी हो सकता है पर इंसानियत ,करुणा ,दया ,प्रेम कितने ऐसे शब्द है जिनका उपयोग करके हम आंगे आकर कुछ कर सकते है ऐसे विकसित होते भारत का क्या मतलब जब एक इंसान का इंसान से मतलब ख़तम हो जाय, ऐसे डिजिटल इंडिया का क्या फ़ायदा जो चुम्बकीय तरंगो को तो जोड़े और अन्तरंग को मिटा दे। ऐसे गतिशील गुजरात का क्या मतलब जब अपने नजर ना आये।

थोडा थोडा ही बदले बदलाव जरुर आयगा। ।

आपका
अनिमेष

मुस्कुराते हुये

तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना  और देखते रहना  मुझे आनंदित करता है  मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें  थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं  और जब तुम्हारी ...