कल तक सीना ताने /धरती पर ,
अडा खडा था /बडा सा /यमल का व्रक्ष,
मजबूत तने पर / सैकडो शाखाओ का विस्तार ,
हज़ारो पंछी / करते थे जिस पर निस्तार,
सुस्ताते थे राहगीर / जिस के नीचे बैठकर,
किसी भले आदमी ने /उसके बाजू मे ,
रखवा दिये थे पानी के बडे बडे घडे,
कोई भला मनुष / उसको भर देता था रोज,
कितनी विस्ञत होती थी/ पहले आदमी की सोच ,
शीतल जल / आरामदेह आसन / प्रक्रतिक छाया ,
बिहगो का संगीत /खेल /कलरव ,
अब कहा मिलते है ऐसे स्थान,
जहा सुस्ताकर मिटाई जा सके थकान,
सुना कल रात की आन्धी मे / गिर गया है ,
तुरत जा कर देखा ,
पडा है धरती पर / औधे मुह / असहाय /अचल ,
शखाओ ने थाम रखा है /धरती का तन ,
और तना आधा उखड़ गया / जुडे रहने की जद्दो जहद मे ,
व्रक्ष की सारी अकड़ निकल गई एक झोके मे ,
जो की जुडा था अभी भी / प्रक्रति से कर रहा था सेवा ,
फिर भी नही सम्भल सका
और आदमी कितना दुर होता जा रहा/ फिर भी अकड़ ज्यो की त्यो ,
देखेगा वह अपना और अपनो का गिरना ,
कुछ शाखाये काट दी गई / कुछ बाकी थी
गिलहरी का एक बच्चा / उछल रहा था वही इर्द गिर्द ,
शायद आन्तिम विदाई दे रहा हो/ अपने खेल के मैदान को ,
एक उसी व्रक्ष की उमर का बुजुर्ग ,,
उस की कहानी /ठीक वैसे ही बता रहा था ,
जिस तरह कोई मित्र /अपने मित्र का परिचय,
उसकी अंतिम यात्रा पर कराता है ! ! !
शनिवार, 11 जुलाई 2015
व्रक्ष का दोस्त
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
मुस्कुराते हुये
तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना और देखते रहना मुझे आनंदित करता है मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं और जब तुम्हारी ...
-
पिछले दिनो मेरे हाथो लगा अपने समय का सबसे विवादित और प्रतिबन्धित लेख , जिसे लिखा था स्वयं भगत सिंह ने , जेल के अंतिम दिनो मे लिखा गया यह ले...
-
तुम्हे मुस्कुराते हुये देखना और देखते रहना मुझे आनंदित करता है मुस्कुराते हुए जब तुम्हारी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो जाती हैं और जब तुम्हारी ...
-
परीक्षा समाप्त हो चुकी थी गर्मी का महिना और वही दादा वाली अटारी, जहाँ जाने में लोगो के पसीने छुट जाते थे वह मेरे बचपन का सबसे बहुमूल्य और आन...