परीक्षा समाप्त हो चुकी थी गर्मी का महिना और वही दादा वाली अटारी, जहाँ जाने में लोगो के पसीने छुट जाते थे वह मेरे बचपन का सबसे बहुमूल्य और आनंददायक स्थान था, जहां बचपन के सबसे खुबसूरत और यादगार दिन बीते, वह अटारी जिस के दरवाजे से दिखता था गजानन टेकरी पर स्थित संतोषी माता का मंदिर और वो जमीन से लगी छोटी खिड़की जो पूरी गली का व्यू पॉइंट था एक दीवार पर टंगी सूर्योदय वाली पेंटिंग जिसे गुडिया बुआ ने बनाया था दादा के जाने के बाद भी अटारी अभी भी जस की तस थी। सलीके से जमी हुई अलमारी वह डेस्क जिस पर वे अक्सर अपना काम किया करते थे अब भी पलंग के आगे रखी हुई थी उनका वह ऐश ट्रे जिसे मैंने कब का पेन स्टैंड बना दिया था । कभी कभी लगता था दादा अभी कही से आ जायेगे पर ऐसा कभी नहीं हुआ। धर्म के नाम पर सिर्फ बाई(दादी) और मम्मी के कहने पर मंदिर जाना और बचपन में दादा द्वारा सुनाई और सुनी हुई प्रार्थना जिसे अब में भूलता जा रहा था या भूल ही चूका था पहले हर शाम वे राजा राणा और प्रभु पतित पावन वाली बिनती लाइट जाने पर सुनते थे । उनके बीमार हो जाने के बाद किसी ने ना सुनी । उस दिन घर पर बहुत बोर हो रहा था वो भी गर्मी की दोपहर का समय था मैं घर पर ही खुरापात कर रहा था तो आचानक अटारी पर जीने से लगी हुई अलमारी के पास कुछ छुपा रहा था तो मुझे मिली एक किताब जिसका शीर्षक था "अपना घर" उसके रचियता थे 'मुनि श्री क्षमासागर जी' एक आकर्षण जागा उस किताब का कवर पेज देख कर तीन उर्ध्वाधर पत्थर जो आपस में जुड़े थे और आकाश की तरफ निहार रहे थे उसे फ़ौरन हाँथ में लिया और पलटना शुरू कर दिया वैसे तो उसमे लगभग 65-70 कविताय होगी पर सबसे पहले पढ़ी "अपना घर" उसके बाद ना जाने वह किताब कब की पढ़ के पूरी हो गई लेकिन अब प्यास और भी बढ़ गई थी.। तो फिर पहुच गया उसी अलमारी के पास, ढूढने लगा,क्षमा सागर जी की कोई और पुस्तक "मुझे तब नहीं पता था कि गुरु मिल गए है और मैं गुरु के गुरु की तलाश कर रहा हूँ " फिर मुझे मिली एक और किताब "आत्मअन्वेशी" जिसे भी लिखा था मुनि श्री क्षमासागर जी ने । इस का कवर तो उससे भी लाख गुना आकर्षक था- आचार्य श्री विद्यासागर जी अपनी चिरयुवा तेजमयी मुद्रा में मुस्कुरा रहे थे वह कोई कविता की किताब नहीं वह थी संस्मरण और आचार्य श्री के जीवन पर आधारित किताब जो आज तक मुझे आधार दिए हुए है जिस ने मुझे भटकने नहीं दिया । मैंने उनको सैकड़ो बार तो पढ़ा होगा पर अभी भी अनपढी सी लगती है । ये दोनों मेरे जीवन के वह गुरु है जिन से मैंने कभी एक शब्द, शब्द क्या अक्षर के बराबर भी बात नहीं की पर
जब भी वह बोलते है तो लगता है जैसे कोई अमृत के घट मेरे कानो में उड़ेल रहा हो । कविताओ को पढो तो लगता है जैसे जीवन दर्शन स्वयं छलक-२ के आंगे आ रहा हो । कुछ कविताय आप के लिए
# और और अपना #
जिसे पाकर लगे
कि अपने को
पा लिया
समझना वह
अपना है
और जिसे पाकर लगे
अपने को
खो दिया समझाना
वह और भी अपना है ।।1।।
जितनी दूर
देखता हूँ
उतनी रिक्तता पाता हूँ
जितने निकट
आता हूँ
उतना ही
भर जाता हूँ ।।2।।
*कभी ऐसा हो*
कभी ऐसा हो
कि देने का मन हो
और लेने वाला
करीब न हो
कभी हम
कुछ कहना चाहे
और सुनने वाला
कोई करीब न हो
तब यह्सास होता है
कि देने और सुनाने वाले से
लेने और सुनने वाला
ज्यादा कीमती है ।।3।।
ये सब तो केवल बानगी है पूरा सागर का सागर है गुरुवर ! और गुरुणां गुरु का तो क्या कहना ।
वैसे तो अभी तक जो भी मिला कुछ न कुछ सीखा कर गया इस लिहाज से सब मेरे गुरु हुए, पर जिन्होंने मुझे इस योग्य बनाया की में सीख सकू उनको सादर प्रणाम ।। हर वह कठिन समस्या जो मेरे सामने आई जिस को अपने प्रयास से हल किया है वह स्वयं मेरा गुरुकुल है, हम जीवन भर शिष्य बने रहे यही गुरु से कामना है । मेरे अन्दर की सारी अच्छाई मेरे गुरुओ की और कमिया मेरी अपनी ।।
आपका
अनिमेष