शनिवार, 23 जनवरी 2016

कुछ यादे कुछ बाते . . !

इस वर्ष के प्रथम लेख में बीते हुए की बात नहीं करुगा,  आने वाले के विषय में चर्चा करते है, संतोष आनंद जी के गीत की कुछ पंक्तियों के साथ " जो बीत गया है वो अब लौट के ना आएगा" और हिंदी की कहाबत है " बीती बात बिसारिये आगे की सुध ले " लेकिन इतिहास एक दर्पण है,एक  शिलालेख , एक मार्गदर्शक है।  हमे उससे सीखना होगा जो  गलतिया हम, हमारा समाज ,हमारा  राष्ट्र  निरंतर करता रहा है वे कही ना कही इतिहास में अंकित है उनमे सुधार करके स्वयं को , समाज को , राष्ट्र को और आने वाले भारत को एक नवीन दिशा दी  जा सके।
वर्ष  २०१५ की शुरूवात में डेली डायरी लिखता था, फिर मई १५ , तक लगातार लिखता रहा कुछ  स्मरणीय लिखा है जब पन्ने पलटता हू तो १३ मार्च २०१५ पर पहुंचकर अपने आप में एकाकी हो जाता हूँ यह वर्ष का वह दिन था जब ऐसा लगा कोई अपना, सब कुछ ले कर चला गया हो. . जो मैत्री वे इस संसार में देने आये थे वह दे कर चले गये, जो " पगडंडिया सूरज  तक"  उन्होंने बनाई थी उसी के रास्ते, जगत को दीप्तमान कर,  सर्वव्याप्त  हो गए. उनका एक "अपना घर"  भी था जो कि कब का, सभी का हो चूका था. अब उस घर में चिड़िया, नदिया, आकाश , पंछी , बच्चे भगवान और स्वयं मैं कब से बसे हुए है पर वो नहीं है इस बात का यहसास अकसर हो ही जाता है वे कौन थे, वे क्या थे , क्या करते थे।  जबाब उनकी ही कविता से 

दीप उनका, रोशनी उनकी , जल रहा हूँ मैं 
रास्ते उनके , सहारा भी उनका , चल रहा हूँ मैं 
ये प्राण उनके , हर सांस उनकी , बस जी रहा हूँ मैं  (मुनि श्री क्षमा सागर जी ) 

गए वर्ष में बहुत कुछ ऐसा था जिसे हासिल करना था पर नही कर पाया , बहुत से ऐसे स्थान ऐसे है जहा जाना था  पर जा नहीं पाया , कितने उत्सव अकेले ही मन को मना कर मना लिए. एक चौकोर से रंग विरंगे डिब्बे में बहुत से सुख-दुःख  सहेज कर कर रखे है, कितना कुछ कहना बाकी रह गया है, बहुत कुछ देना और कुछ लेना बाकी है, कितने अपने मेरे इंतज़ार में बैठे है और कितनो का इंतज़ार में कर रहा हूँ. स्वतंत्रता है पर उसकी  अपनी सामाजिक सीमा है,  आसमान खुला हैं पर, परों का बंधन है, बस सब का सामंजस्य बनाते हुए पारो का बंधन खोलना है सीमाओ को और विस्तार देना है. और आकांक्षा है की समस्त लोग एक दूसरे को स्थान देते हुए अपने आप को स्थापित करे।  .


नववर्ष के लिए लिख रहा था पर समय पर पूरा नहीं हुआ सोचा अपने मित्र के जन्म दिन पर इसे पूरा कर दू ,
विकास  भगत रफ़ी जी को जन्म दिन की हार्दिक शुंभकामनाये।

दोस्त हो जीवन में तो कांच और परछाई से ,ना झूठ बोलेगे और ना ही साथ छोड़ेगे।

ऐसा मित्र मुझे जीवन में मिला, मुझे गर्व है , बचपन से साथ-साथ खेले और बड़े हुए, उम्र में मुझ से तीन वर्ष बड़ा है या ये कहू की बड़ा भाई और दोस्त का संयुक्त मेल है तो कम ना होगा, मेरे अंदर यदि जो कुछ भी अच्छा है उस में उस का विशेष हाँथ है हो सकता है वह अच्छी  बात मैंने कही और से सीखी  हो पर मेरे अंदर वह रह पाई इस में उस का विशेष योगदान है.  हम दोनों यदि सामाजिक बुराइयो से दूर है तो एक साथ है,  कभी मैंने तो कभी उसने एक दूसरे का मनोबल ऊंचा किया। वह मुझ से अधिक परिपक्व है, योग्य है , श्रेष्ठ है परिश्रमी है, सहज है, सरल है, जिम्मेदार है, समर्पित है, लगनशील है, विचारशील है, रचनात्मक है,
उस पर जितना भी लिखुगा कम होगा इसलिए कम लिखे को आप सब ज्यादा समझना।

आपका
अनिमेष

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