दोस्त भगबान का सबसे सुन्दर उपहार होते है ! कुछ दोस्त इतफाक से मिलते है , जैसे कोई पानी की बूंद सीप से मिलती है, और एक नवीन मोती का निर्माण करती है ! और दोस्ती मोती की वो माला होती है , जो केवल और केवल उत्साह, उमंग, सहयोग, प्रेरणा और फिक्र की एक ऐसी माला होती है, जिसमे एक गांठ होती है जो सबको जोड़ने का काम करती है !
कई बार ये गांठे जिन्दगी को इस तरह जोड़ने का काम करती है जो कभी खुल नहीं पाती और आप उन गांठो के सहारे ही अपने आप को एक दूसरे से इतना जुड़ा हुआ और नजदीक पाते है ,कि उनसे जिन्दगी कि कई छोटी गांठो को नजर अंदाज कर देते है, केवल और केवल एक बड़ी गांठ के कारण हम सब आपस कि छोटी गांठो को भूल जाते है और मोतियों की एक ऐसी माला पिरोते हैं जिसमे जीवन को खूबसूरत और आनंदमय बनाने के लिए हर मोती अपने आप को आगे करने का प्रयास करता है !
कई बार ये गांठे जिन्दगी को इस तरह जोड़ने का काम करती है जो कभी खुल नहीं पाती और आप उन गांठो के सहारे ही अपने आप को एक दूसरे से इतना जुड़ा हुआ और नजदीक पाते है ,कि उनसे जिन्दगी कि कई छोटी गांठो को नजर अंदाज कर देते है, केवल और केवल एक बड़ी गांठ के कारण हम सब आपस कि छोटी गांठो को भूल जाते है और मोतियों की एक ऐसी माला पिरोते हैं जिसमे जीवन को खूबसूरत और आनंदमय बनाने के लिए हर मोती अपने आप को आगे करने का प्रयास करता है !
अक्सर हम मंदिरों, पूजास्थलों, पर एक निच्चित संख्या में अपने आराध्या को यद् करने के लिए माला देते नजर आ ही जाते है ठीक उसी तरह हम अपने जीवन में अपने मित्रो को समय समय पर याद करते रहते है। अक्सर हैम अपने दोस्तों को जब याद करते है जब हमारा मन खुल कर हसने और वातावरन को बहुत आनन्द से भर देते है। और तब याद आता है बचपन में कि गई शरारते जिन पर तब फूट फूट कर रोते थे और अब उन बातो को याद कर ठहाका लगा कर हस्ते है। जब कि में ये सब लिख रहा हू तो मुझे ना जाने कितने ऐसे दोस्त याद आ रहे है जिनसे मिले बहुत अरसा हो गया, शायद अब उनका चहरा भी आसानी से पहचाना न जाये। मुझे बचपन से ही दोस्त बनाने का बहुत शौक रहा है ,
और बहुत लोगो को अपना दोस्त ट्रैन में, बस में , किसी जगह बहुत आसानी से लोगो को अपना मित्र बना लेता था , पता नही क्यों ये आदत अब कम और कम होती जा रही लोगो से बात करने में जितना सहज हुआ करता था में, अब शायद उतना नही रहा। अपने मन की बताने से पहले बहुत कुछ सोचते सोचते खुद ही सवालो के घेरे में आ जाता हूँ। लिखना तो बहुत कुछ है बस होसले कि जरुरत hai … !!! कुछ लोग साथ चलते चलते ………इस तरह निकल लेते है , कि फिर कुछ उम्मीद टूट जाती है , भरोसा ख़त्म होता जाता है , मंजिल पास , लेकिन अकेले चलने में रास्ता दूर हो जाता है।
फिर याद याद आती है कुछ पंक्तिया " पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर।
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