रविवार, 3 अप्रैल 2016

जमीन से जुडा भारत

जो कुछ भी आगे लिखने जा रहा हूँ वो ना तो गर्व करने लायक है वल्कि समाज,सरकार, और इंसानियत पर ठोस तमाचा है. जो तस्वीर में बयान करने जा रहा हूँ वह  वापी रेलवे  स्टेशन की है वापी एक ऐसा शहर जिसके चारो तरफ उद्योगों का जाल नहीं बल्कि जंजाल है। ट्रांसपोटरों का सबसे बड़ा आड्डा है पुरे देश के लोग पैसा कमाने आते है। आप को सुनाता हूँ आँखों देखा हाल समय था लगभग शाम के ५ बज रहे थे और और टिकिट खिड़की पर भीड़ भी बढती जा रही में भी पंक्ति में खड़ा खड़ा जो कुछ देख तो रहा था बह मुझे अन्दर तक झकझोर गया। एक 4 साल का छोटा बच्चा बंद खिड़की के पास निचे की तरफ एक ब्रैड(डबल रोटी) का पैकेट और एक में सब्जी का पैकेट लिए बैठा था और अनुमान के हिसाब से उसने वह सब भीख से आये रुपयों से ख़रीदा होगा। शरीर पर सिर्फ एक आधा फटा टी-शर्ट और आँखों में शायद किसी का इंतजार और देखते ही देखते एक लगभग 6 वर्ष की एक लड़की अपने साथ 2वर्ष की एक और लडकी को गोद में लेकर आई और उससे कुछ बोला और कतार में लगे लोगो से भीख मांगने लगी इस बीच वह 4 साल का बालक ब्रैड और सब्जी को खाने लगा। पहले उसने एक एक करके ब्रैड  जमीन पर निकाले फिर एक पालीथीन के एक छोटे से पैकेट पर सब्जी निकाली और उसमे से थोड़ी सी सब्जी जमीन पर भी आ गई। और वह उसे बिना किसी बात का संकोच किये बिना खाने लगा ।जमीन पर ब्रैड जमीन पर सब्जी एक स्टेशन पर टिकट खिड़की के पास की जमीन जिस पर दिनभर में कितने लोग आय होंगे और हम अपने बच्चो को सीखाते है जमीन पर गिरी हुई चीज़ नहीं खाना खाना चाहिए तो फिर ये बच्चा किसका है इसे कोन बताएगा । कहा है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ,रोटरी क्लब , लायंस क्लब , NGOs ,कॉरपोरेट्स की सामाजिक जिम्मेदारी का २% और सबसे महत्वपूर्ण मानवता,इंसानियत ।

।एक बार मन में बिचार आया की तस्बीर निकालकर तुरतं प्रधानमंत्री को दिखाऊ उन्होंने कहा था  आप अपने आस पास के दुर्लभ चित्रों को मेरे साथ साझा करे,(इससे दुर्लभ क्या होगा ?) इससे भारत में पर्यटन उद्योग का विस्तार होगा, पर हिम्मत नहीं कर पाया में किसी ऐसी और मर्मस्पर्शी चीज़ को बिस्तार नहीं देना चाहता जो किसी के मनोरंजन का कारन बने जो आज कल प्रचलन में है । लोग सोशल मीडिया पर किसी बात को साझा करना भर अपनी जिम्मेदारी समझ कर बैठे है। एयर कंडीशंड हॉल में बैठ कर गर्मी की बाते करना बहुत आसन है पर मई की गर्मी में खेत तैयार करना अलग बात है ठीक वही  बात यहाँ लागु होती है  और सबसे बेहतर काम है वाटसअप पर विचारो के गरम गरम पकोड़े , बड़ा पाव ,समोसा(अपने स्वाद अनुसार ) तलो और दिनभर बाटते रहो। सबसे आननद का काम है मस्त रहो मस्ती में ।  बहुत गर्व महसूस होता जब रतन टाटा का रेस्तोरेस्ट वाला अनुभव साझा करते है पर उससे सीखते कुछ भी नहीं,रत्ती भर भी नहीं ।
रात को महाराष्ट्र के सूखे और पानी पर बड़ा सा सन्देश भेजेगे और सुबह से वही घोडा वही मैदान,रात गई बात गई। ये भारत है जी भारत । इंडिया वालो को इससे क्या? कोई भूखा रहे या प्यासा , पेट भर अनाज हो या ना हो, तन ढकने के लिए कपडे, और पता नहीं क्या क्या नहीं है इंडिया वाले भारत में ?
लेकिन हम इनके लिए नहीं लड़ेगे हम लड़ेगे पाकिस्तान से मोदी से,केजरीवाल से,ओबीसी से ,आरक्षण से ,जाटो से। तथा तथित बुद्धिजीवी लोगो को देश में असहिष्णुता नजर आती है पर गरीवी और भूख नहीं ,कभी देश के भूखे और गरीब लोगो के लिये संसद भंग होते नहीं देखी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और और मुंबई से मेघालय तक पुरे देश का यही हाल है। कुछ प्रान्तों में हालत इससे भी बदतर है फिर भी हम लड़ेगे भाषा पर , भारत माता पर , भागवत पर । कांग्रेस मैया की सरकार हो, या भा ज प भैया की या फिर लिट्टे चोखा की गठबंधन सरकार, बुआ और भतीजे की सरकार या लाल सलाम सब यही चाहते है देश की आधी आबादी भूखी नंगी अशिक्षित रहे ताकि हर पांच साल बाद इनको एक दारु की बोतल चंद गुलाबी कागज और कुछ मुंगेरी लाल के हसीन सपने थमा कर सत्ता रूपी रूपसी का भोग करते रहे और बोलते रहे भारत माता की जय । । हमारा समाज भी कहाँ चाहता है बदलना जिसे मौका मिलता है लग जाता है शोषित का शोषण करने, जो अधीन है वह अधीन ही रहे समानता प्राप्त ना करे। यह भारतीय मानसिकता का विशेष लक्षण है। में कितने लम्बे समय से इस बात का अनुभव करता रहा हु कल एक छोटे से बालक ने वो सब कुछ सोचने पर विवश कर दिया लिखने को बहुत है पर सच लिखने की जबाबदारी है कुछ पंक्तिया याद आ गई तो आप से साझा करता हूँ

"जब आँख खुली तो देखा यह
शोषित पीड़ित ही भरे पड़े है
जगती के बिस्तृत प्रांगण में
अधिकांश जनो की कुटिया पर
अधिकार जमाए है कंगाली
जिन की निधि की सूची यह है
टूटी हडिया फूटी थाली
धुत्कारे खा कर जीते है
आंशु पी कर रहते है
ऐसे दीनो की आंहे तुम तक
पहुचाने आया हूँ
करुणा का कवि हूँ
कण कण में करुणा बिखराने आया हूँ "
(धन्य कुमार जी सुदेश )

वहां पर लगभग 200 और लोग होगे पर किसी का मन ना पसीजा शायद ये उनके लिए आम बात होगी या फिर फर्क होगा द्रष्टिकोण का या फिर वो ये सोचते होगे की ये भी कोई ढोग ही होगा या नज़र नहीं गई होगी कुछ भी हो सकता है पर इंसानियत ,करुणा ,दया ,प्रेम कितने ऐसे शब्द है जिनका उपयोग करके हम आंगे आकर कुछ कर सकते है ऐसे विकसित होते भारत का क्या मतलब जब एक इंसान का इंसान से मतलब ख़तम हो जाय, ऐसे डिजिटल इंडिया का क्या फ़ायदा जो चुम्बकीय तरंगो को तो जोड़े और अन्तरंग को मिटा दे। ऐसे गतिशील गुजरात का क्या मतलब जब अपने नजर ना आये।

थोडा थोडा ही बदले बदलाव जरुर आयगा। ।

आपका
अनिमेष

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