रविवार, 1 मई 2016

ख़ामोशी . . .

एक क्लास में टीचर ना हो और स्टूडेंट शांत हो, एक मैदान में रोमांचक खेल चल रहा हो और दर्शक चुपचाप बैठे हो,  कितनी उलटी बात कर रहा हूँ मैं । भला ऐसा भी होता है कभी,वैसे भी कौन चुप रहता है आज कल सब के पास कुछ ना कुछ कहने के लिए बोलने के लिए बताने के लिए साझा करने के लिए है  और ऊपर  माध्यम भी बहुत है, कहने को दोस्तों की कमी भी नहीं है हर बात हर पल यहाँ से वहा, वहा से यहाँ होती ही रहती है
पर कुछ एक लोग आप को मिलेगे खामोश रहने वाले। कहकर भी कुछ ना कहने वाले, सोचने ज्यादा और बोलने कम वाले, ना किसी से शिकवा , ना किसी से होड़, उनकी अपनी जिन्दगी और अपनी अपनी दौड़ ।
इनके पास बोलने के लिए बहुत कुछ है पर वे अक्सर इस बजह से अनकहे रह जाते है कि उनकी बात समझेगा कौन ? ख़ामोशी इनकी ताक़त भी है और कमजोरी भी। रास्ता भी है और मंजिल भी है । क्यों की ये लोग तथ्यों को इतनी बारीकी से अध्यन कर के वैठे होते है की कोई इनको जरा भी उकसा दे तो, किसी विस्फोटक की तरह अपना रुख अख्तियार कर लेते है विचारो का एक गहरा समुन्दर इनके अन्दर तक पसरा रहता है एवं देश की समकालीन घटनाये जो की व्यक्तिगत हो या सामाजिक इनके अन्दर किसी सरिता की तरह प्रवेश कर एक नवीन मुहाना बनाती है और उस पर होती है तर्क और वितर्क की खेती बिना किसी उर्बरक और कीटनाशक के । पर इसका पता कोई नहीं लगा सकता की फसल कौन  और कब कटेगा। यह वह फसल  है जो सदा हरी भरी रहती है भले ही जीवन कितना भी नीरस हो या सरस, अंधकार में हो या प्रकाश में, ढलान पर हो या चढाव पर , विचारो का खेत सदा लहलहाता है चाहे वह कैसे भी हो,  सकारात्मक या नकारात्मक विचार तो आने ही आने है कुछ लोग व्यक्त कर देते है कुछ बचा कर रखते है समय पर बोलने के लिए और समय कभी नहीं आता । और हम जैसे लोग अनकहे या खामोश रह जाते है, कई बार खामोश सिर्फ इसलिए रहते है कि जो कुछ कहेगे वह जी का जंजाल बन जायेगा खुद के लिए भी और दूसरो के लिए भी। इसलिए बेहतर है ख़ामोशी ।

अक्सर लोग ख़ामोशी को कमजोरी समझ लेते है, पर  वही ताक़त का संचय कर के बैठी है, और आप उसके कृपा पात्र है ना जाने कब ख़ामोशी का एक दुबका सा शब्द उछल कर हलचल मचा दे। जिन्दगी से नाखुश लोग ख़ामोशी का दामन थाम लेते है और निर्दोष भाव से चुपचाप अपने आप को संलग्न कर देते है।खुश मिजाज लोग भी अपनी मन को बात बताने में चुप ही हो जाते है ।
आस पास के लोग ऐसे लोगो का मजाक बना देते है वे उन्हें परेशां करने का, नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और ना जाने कितने प्रकार के मानसिक दर्द उस व्यक्ति को सहन करना पड़ते है जबकि वह खामोश सिर्फ इसलिए है के उसके आस पास के लोग शांति और सुख से रह सके पर उनकी यह बात समझने वाला कोई नहीं।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह बोलता है की जब भी मेरे पास बोलने के लिए बहुत कुछ होता है तब में खामोश हो जाता हूँ। किस से कहू ?क्या कहू?  और कितना ?
घर से दूर अनजानो में अपनो  की तलाश, पतझर में बसंत के सपनो की तरह है ।।

एक छोटी रचना शीर्षक है
               

                             ख़ामोशी

जिन्दगी हर एक कदम पर ख़ामोशी का इम्तेहान लेती है ।
वो ये देखती है कि ख़ामोशी आखिर कब तक चुप रहती है ।।

ख़ामोशी कितने दर्द सहन कर लेती है ।
बिना बोले सब अपने अन्दर समेट लेती है ।।

फिर भी ख़ामोशी से दर्द का हिसाब चिल्ला चिल्ला कर माँगा जाता है ।
उसके शांत रहने का मखोल उड़ाया जाता है ।।

जिस दिन भी ख़ामोशी एक शब्द भी आंगे आकर बोलेगी ।
ना जाने कितने घर की दीवारे डोलेगी ।।

ख़ामोशी उफनती नदियाँ नहीं समंदर है ।
हजारो नदियाँ जिस के अन्दर है ।।

जब मैं कुछ कह नहीं पाया,
ख़ामोशी को शब्द बना डाला ।
चीखने लगा कलम से कागज पर,
पत्थर धरा रह गया मेरे साहस पर । ।

आपका
अनिमेष

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