बुधवार, 7 दिसंबर 2016

सुनो सांसदों . . .

मेरे राष्ट्र के तथातथित निर्माताओ. . (मतलब राजनेताओ)
आपको सादर नमस्कार . . आप में से बहुतो की उम्र तो प्रणाम और चरणस्पर्श करने की है पर आपके कार्य और हरकते देखकर मेरा अंतरमन सिर्फ औपचारिकता पूर्ण करने के लिए नमस्कार कर रहा है।

पहले स्पस्ट कर दूँ में यानि की अनिमेष सिंघई ना पत्रकार हूँ , ना किसी पार्टी का सदस्य, और ना ही किसी संघटन का कार्यकर्त्ता। में भारतीय नागरिक हूँ जिसे संविधान के अनुसार मतदान का अधिकार है, एवं निर्वाचित प्रतिनिधि से अपनी समस्या कहने और सवाल करने का पूरा अधिकार है।

अब सुनिए . . .

पिछले दो हफ्तों से संसद में आप सब ने हंगामा मचा रखा है, दो कोड़ी का भी काम नहीं हुआ पिछले दिनों, संभव है आप 545+230 सांसदों का समय महत्वपूर्ण ना हो पर पर देश की 125 करोड़ जनता का एक एक सेकंड महत्त्व पूर्ण है जिसे आप जैसे लोग नहीं समझ रहे। आप को वहां पर समस्याओ का हल खोजने के लिए भेजा गया है पर आप की कार्यविधि देखकर लगता है आप देश के लिए खुद एक समस्या बन गए है। सुबह 11 बजे संसद का माहौल का ठीक वैसा ही रहता है जैसा हमारी गली में रात 11 बजे सारे कुत्ते एक साथ आकर भौकते रहते है बिना ये समझे की उनके भौकने से देश की आम जनता को कितनी तकलीफ हो रही है। विपक्ष के कुछ नेताओ को देख कर मुझे लडैयों सियारो की याद तक आ चुकी है जो शमशान में मृत शरीर की हड्डियों के लिए इसी तरह की चिल्लम चिल्ली करते है। आप लोगो को भी कई बार किसी की मौत को मुद्दा बनाते देखा है। आप ये क्यों भूल जाते है आप हमारे प्रतिनिधि है आप हमारी आवाज वहां पंहुचानी है लेकिन आप को तो अपनी राजनैतिक रोटियां बनानी होती है। बहुत पसंद है आप को ऐसी वेदना में डूबी हुई खून से सनी हुई,दंगो में पकी हुई, भ्रस्टाचार में चुपड़ी हुई रोटियाँ।

आज देश में परिवर्तन की नई बयार चली है पता नहीं यह अपने उद्देश्य को हासिल करेगी या नहीं ? देश का आम नागरिक परेशान है उसकी समस्या कैसे कम की जाये इस विषय पर विपक्ष के किसी नेता एक भी सुझाव या बयान नहीं दिया वल्कि सरकार की आलोचना की- जानता हूँ विरोध करना आप का काम है । आप विरोध करे पर पर तरीका ये नहीं होना चाहिए। मैंने जब सेकेंडरी स्कूल में राजनीती शास्त्र पढ़ा तो उसमे मैंने पढ़ा था किस की क्या भूमिका और कार्यक्षेत्र है। लेकिन जब आप प्रधान मंत्री जी से बात बात पर जबाब मांगते तो समझ नहीं आता की वे प्रधान मंत्री है या हल्लू के दादा। देश के किसी स्थान पर यदि कोई घटना होती और कोई व्यक्ति उस कारण से मरता है तो उसके लिए प्रधान मंत्री कैसे जिम्मेदार हो सकता है । जिम्मेदार होना चाहिए वहां के  प्रशासन जन प्रतिनिधि  सरपंच विधायक नगरपालिका आदि को ! लेकिन आप उन से नहीं पूछेगे क्यों उस में आप की पोल खुल जायेगी। आप के जमीनी फण्ड और सियासीचाल बाजियां वही से चलती है क्यों नहीं होती किसी जिम्मेदार पर कार्यवाही ?? आप भी राज्य सरकारों में है?

आप ने  धर्म,जात, पन्त , क्षेत्र, भाषा , रंग के नाम पर इस देश को इतने हिस्से में बाँट दिया है अब खुद से संभाला नहीं जा रहा। अपने 60 वर्ष के शासन काल में आप ने इस देश को सहन करने की इतनी सहनशक्ति दी है कि अब ये आप की जहिल, गैरजिम्मेदार,  अलोकतांत्रिक हरकतों को रोज सहन करता है और उफ़ तक नहीं करता। आप को संसद में भेजा गया है बहस करने के लिए आप तो उसे पता नही क्या समझ बैठे है। आप की पार्टी ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए है आप उस की नाक कटवा रहे है। और ये फर्जी समाजवादी और कम्युनिष्ट अपने महान नेताओ को लजा रहे है । आदरणीय दीदी बंगाल से भारतीय राजनीती में दो दादा रहे है और उन्होंने अपने काल में इस संसद का मान ही नहीं बढाया बल्कि गौरवान्वित भी किया। हाँ में बात कर रहा हूँ सोमनाथ दा, और प्रणव दा की , आप उनसे कुछ तो सीखिए । आप को खिसयानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचे जा रही है। और आप के भाई प्रातः स्मरणीय, चंचल , नटखट मनोहारी देश को गंभीर हास्य और खांस देने वाले आदरणीय अरविन्द जी केजरीवाल। उनके लिए एक शेर याद आता है बशीर बद्र साहब का

" अदब की हद में हूँ अब अदब नहीं होता
  वो भी सुना है उसने जो मेने कहाँ नहीं "

नियम अनुसार किसी भी शासकीय या प्राइवेट कर्मचारी को वेतन तभी मिलता है जब वह कम से कम प्रतिदिन 8 घंटे कार्य करता है। यदि यह नियम संसद, विधानसभा, नगर निगम और नगर पालिका में लागू कर दिया जाये तो ?? जब तक आप 8 घंटे ऑन रिकॉर्ड कार्य नहीं करते उस दिन का वेतन भत्ते सहित काट लिए जाये। वो भी सभी का एक साथ ताकि बाकी दुसरो के कार्य में बाधा न उत्पन्न करें। निश्चित मानिये यदि ऐसा होता है तो इस देश की तस्वीर एक ही वर्ष में बदल जायेगी । आप को विरोध करना है करो सुबह से शाम तक करो लेकिन शाम से रात तक संसद चलाओ । नोट बंदी के बाद पूरा देश किसी न किसी स्तर पर परेशान है वह संसद की तरफ आशा से देख रहा है कि विपक्ष और सरकार मिलकर उनके लिए कुछ बेहतर कदम उठायेगे। पर अब इस देश की आप से उम्मीद कम हो रही है। आप सब तो बड़े नेता लोग है हमारे यहाँ छोटी सी जगह की भी यही हालत है। मुझे लगता है में भैस के आंगे बीन बजा रहा हूँ।

अभी अभी खबर मिली है कि आदरणीय जयललिता जी का लम्बी बीमारी के बाद स्वर्गवास हो गया। तमिलनाड की जनता उनको यूँ ही "अम्मा" नहीं बुलाती थी। वल्कि उनके कार्य भी एक अपने राज्य की जनता के लिए एक माँ के सामान ही थे। गरीवो के लिए भोजन सुलभ कराना आसन कार्य नहीं है। इश्वर उनकी आत्मा को शांति दें। ॐ शांति . . शांति. . शांति . . !

लिखने का मन बहुत था पर आज के लिए इतना काफी है।

आपका
अनिमेष

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