सोमवार, 14 नवंबर 2016

प्रतीक्षा (गीत)

प्रतीक्षा
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ मैं समीक्षा कर रहा हूँ ।
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
सपने सारे सच हो सबके
कोई न फिर राह भटके
हो अँधेरे तो रौशनी दे
चल सके सब हौसले दें
गिरते को तुम थाम लेना
डूबते को उबार लेना
बोझ सारा बाँट लेना
मुश्किलों में साथ देना
इस प्रतीक्षा की घडी में सारे जग से लड़ रहा हूँ
मैं समीक्षा कर रहा हूँ और आगे बढ़ रहा हूँ
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
धूप हो तो छाव बनना,
बारिशो में छतरी बनना,
नींद में तुम सपने बुनना,
जागते ही साकार करना
सारे जग से प्रीत करना
सबकी सारी पीड़ाए हरना
उम्र भर को जो चाहते हो
उससे ऐसा सिलसिला रखना
इस प्रतीक्षा की घडी में खुद से ही लड़ रहा हूँ
मै समीक्षा कर रहा हूँ हाँ में तुम से बिछुड़ रहा हूँ ।
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।
शब्द सारे बौने पड़ गए
अपने सारे खोने पड़ गए
जो रास्ते तुम तक थे आते
वो ही हम को आँख दिखाते
जो हवाए संदेशे थी लाती
कर ली तुम ने  कैद सारी
धड़कने है अब भी तुम्हारी
लौटकर आ जाओ साकी
इस प्रतीक्षा की घडी में आवाज तुम को दे रहा हूँ
मै उपेक्षा सह रहा हूँ  लौट आओ तुम से कह रहा हूँ
खुद ही खुद से कह रहा हूँ खुद ही खुद की सुन रहा हूँ ।

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