अभी अभी शहर में गुलाबी ठण्ड ने दस्तक दी ही थी, हलकी हलकी ठंडी हवा जब छू कर गुजरती तो उसकी ठंडी गुदगुदाहट अन्दर तक महसूस की जा सकती थी। शाम में यदि ऐसा खुश रंग मौसम हो और चाय के साथ कचोरी मिल जाये तो जीवन का जायका भी लज्जतदार हो जाता है। गौरांग अक्सर शाम को घर लौटने से पहले शर्मा मिष्ठान भण्डार से गर्म हींग वाली कचोरी और मूंग के भजिये खा कर ही जाता, अब तक दुकान के मालिक राम गोपाल शर्मा जी से भी उसकी अच्छी जान पहचान हो गई थी। एक शाम को जब वह वहां पर कचोरी खा रहा था तभी वहां पर उसके ऑफिस में ही काम करने वाली अंशिता बैनर्जी आ गई । दोनों एक ही ऑफिस में थे पर उनके विभाग अलग अलग होने के कारण आते जाते ही देखा था उन्होंने एक दुसरे को । मुह में कचोरी चबाते हुए एक दिल फेक मुस्कराहट उसने अंशिता को दी और कदम बढ़ाते हुए उसके पास पहुच गया। उसने उसका नाम लेकर पूंछा : "अंशिता जी आप यहाँ कैसे?"
अंशिता ने जबाब दिया " जैसे आप" और वहाँ पर ठिठक कर बैठी मुस्कराहट कब ठहाका बन गई पता नहीं चला। अगला सवाल अंशिता ने किया आप को मेरा नाम कैसे पता चला?? गौरांग ने कहाँ "लड़के अक्सर लडकियों के नाम पता कर लेते है मोहतरमा, और नहीं करते तो आस पास के लोग बता देते है रे बायो-डाटा के साथ अंशिता बोल पड़ी तो आप के पास मेरा पूरा बायो- डाटा है ।
उसकी बात को बीच काटते हुए गौरांग ने पूछा क्या खाना पसंद करेंगी आप ? कचोरी या कुछ और ?? अंशिता ने जबाब दिया-आप के साथ फिर कभी और अभी तो घर पर ले जाने के लिए आई हूँ वैसे भी देर भी हो रही है। और वह अपना पार्सल लेकर घर चाली गई पर उसकी बेबाकी और खुदरंग मिजाज गौरंग के दिल में सुनामी मचा गया। जैसे जैसे कचोरी उसके पेट में उतरती जा रही थी वैसे वैसे ही अंशिता उसके दिल, दिमाग में छा रही थी। घर पहुच कर सबसे पहले उसने अंशिता को फेसबुक पर सर्च किया पर मेहनत कुछ काम नहीं आई। गौरांग बहुत उदास हो गया, अब उसे इन्तजार था तो अगली सुबह का ताकि अंशिता को देख सके और यदि मुमकिन हुआ तो कुछ एक मिनिट मिल भी सके। जैसे तैसे रात कटी भाई साहब की, सुबह देर तक सोने वाले गौरांग साहब आज सुबह कुछ ज्यादा ही जल्दी उठ गए थे। आकर्षण में कुछ ऐसा ही जादू होता है। तैयार होकर समय से कुछ पहले ही ऑफिस पहुंच गए थे गौरांग भाई, आसमानी रंग की जींस पर कलफ की गई कॉटन की हाफ स्लीव ब्लैक शर्ट कुछ ज्यादा ही जच रही थी, चेहरे पर अलग ही रौशनी थी । बहुत ही बेताबी के साथ एंट्री गेट पर अंशिता का इन्तजार हो रहा था। वैसे भी इन्तजार से प्रेम बढ़ता है| पर ये क्या, ऑफिस आने का समय तो निकल गया था अभी तक नहीं आई थी अंशिता ।
उसके चेहरे की चमक फीकी पढ़ गई और बैठा हुआ दिल लेकर चुपचाप अपनी डेस्क पर पहुँच कर कॉफ़ी के गर्म घूंट के साथ वेस्वाद हुई सुबह में कुछ मिठास घोलने की कोशिश करते हुए अपना डेस्कटॉप चालू किया, तो पिछली शाम को तैयार की गई टू-डू लिस्ट सामने थी जो कि आज पूरे दिन में उसे पूरा करना था । गौरांग अपने काम में कुछ इस तरह व्यस्त हुआ कि उसे पता ही नहीं चला कि लंच का टाइम हो गया। वह दिन में खाना सिर्फ इसलिए खाता था कि शाम तक का समय निकल जाये और कुछ टाइम कैंटीन में दोस्तों के साथ गप-शप कर के रिलेक्स हो लिया जाये ताकि फिर से तरोताजगी के साथ काम पर लौटा जा सके। वैसे यदि कोई स्वादिस्ट टिफिन मिल जाये तो जम कर लंच कर लेते थे मिस्टर गौरांग। कैंटीन का खाना गौरांग को बिलकुल भी पसंद नहीं था कभी कभी तो वह कैंटीन जाता भी नहीं था यहाँ वहां घूम कर अपने आप को फ्रेश कर लेता था लेकिन आज जब वह कैंटीन पंहुचा तो सामने अंशिता अपने दोस्तों को कुछ मिठाईयां खिला रही थी। अंशिता को देखकर तो भाई साहब की थकान तो उतर ही गई थी पर चेहरे पर हाव भाव कुछ मिले जुले से ही थे । इसी बीच दोनों की आँखे मिली और मुस्कराहट के साथ आँखों ही आँखों में बात हुई पर पता नहीं किस ने क्या कहा और किसने क्या समझा? गौरांग अपने मित्रो के साथ और अंशिता अपने दोस्तों के साथ, अलग लाइन की अलग टेबल पर, परन्तु आमने और सामने, ताकि एक दुसरे को दिखाई दें सके कुछ इस तरह से बैठ गए। खाने के बीच में चार आठ बार तो नज़रे मिल ही गई दोनो की आपस में ।लंच का टाइम ख़त्म होने के बाद गौरांग तो आ गया पर उसका मन अभी भी कैंटीन में मिठाई बाँट रही अंशित पर अटका हुआ था। वह यह ही सोच रहा था आखिर अंशिता मिठाई क्यों बाँट रही थी।
यही सोचते सोचते शाम हो गई. ऑफिस से निकलते समय एक नज़र पार्किंग में खड़ी अंशिता की स्कूटी पर दौड़ाई और अपनी बाईक स्टार्ट कर रोज की तरह शर्मा मिष्ठान भण्डार पर पहुँच गए। हींग वाली कचोरी खाते खाते ही देखा कि अंशिता आज फिर वहां आ रही है। भाई साहब की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा बांछे खिल गई थी उनकी तो। अंशिता ने आते ही बैग में से मिठाई एक डिब्बा निकलते हुए गौरांग की तरफ बढ़ा दिया। इससे पहले की गौरांग कुछ पूछ पाता अंशिता ने खुद ही बता दिया कि आज उसका जन्म दिन है। गौरांग ने सिर्फ जन्म दिन की शुभकामनाये ही नहीं दी बल्कि शर्मा जी के यहाँ के प्रसिद्ध गुलाब जामुन और खोये की जलेबी कचोरी के साथ मंगवा ली साथ ही ये भी बोल दिया अंशिता को ये सब आज साथ में खाकर ही जाना होगा। कचोरी और जलेबी के बीच गौरांग और अंशिता बातों पर बांते करते जा रहे थे और समय का किसी को ध्यान ही नहीं रहा। दोनों का ध्यान जब टुटा जब अंशिता के घर से उसके मोबाईल पर फ़ोन आया। समय देखा तो 7 बज चुके थे। अंशिता ने जाने को बोला तो गौरांग ने अपने बैग में रखी हुई चोकलेट अंशिता की तरफ Happy birthday वन्स again बोलते हुए हाँथ पर रख दी। एक प्यारी सी मुस्कराहट के साथ दोनों एक दुसरे को देखा और चल दिए अपने अपने आशियानो की तरफ।
वह अंशिता में अपनी ड्रीम गर्ल को ढूढने लगा था। लेकिन वह कोई जल्दबाजी न करते हुए पहले एक अच्छा दोस्त बनना चाहता था । अंशिता अब तो उसके सपनो में भी दस्तक देने लगी थी। अक्सर ऐसा ही होता है जब आप किसी की ऒर आकर्षित होते है तो वो जीवन का हिस्सा बन जाता है हर एक जगह आप को सिर्फ उसी का ख्याल आता है। आप सोचते है यदि वह होती तो ऐसा बोलता, ऐसा करता, यहाँ जाता वहां जाता और न जाने क्या क्या ख़याली पुलाव पकते रहते है मन में| जितना में गौरांग को जनता हूँ तो झिजक उसके अन्दर कूट कूट के भरी है वह अंशिता का मोबाईल नंबर चाहता था पर मांगने में झिजक रहा था। पर वह कहते है न कि जिसे सच्चे दिल से चाहो तो उसे मिलाने में पूरी कायनात लग जाती है। अगले दिन हुआ भी कुछ ऐसा ही अंशिता ऑफिस से निकल रही थी तभी उसे किसी ने पीछे से आवाज लगाई बेनर्जी मेडम सुनिए तो जरा उसने पीछे मुड़ कर देखा तो वह गौरांग ही था। उसने अपने जेब से एक छोटा सा key chain निकाल कर अंशिता की हथेली पर रख दिया। वह कुछ पूछ पाती गौरांग ने कहा ये तुम्हारे जन्मदिन का गिफ्ट है, इतना कहकर वो वहां से निकल गया और पंहुचा वही शर्मा मिष्ठान भण्डार पर जैसी ही उसने अपनी गाड़ी खड़ी करी वहां पर उसने देखा कि अंशिता भी आ गई।
अंशिता ने कहा आज कचोरी मेरी तरफ से दीक्षित सर के लिए।जोरदार ठहाके के साथ दोनों हस्ते रहे। बातों बातों में अंशिता ने गौरांग से उसका मोबाइल नम्बर मांग लिया, पर गौरांग चाह कर भी उससे मोबाईल नम्बर नहीं ले सका। वह तो नम्बर लेकर चली गई पर गौरांग उसके फ़ोन,मैसेज आने का इंतज़ार करता रहा। उसदिन कोई मेसेज नहीं आया, वो आँखों में इंतज़ार लिए ही सो गया। लेकिन जब सुबह जागा तो inbox में एक सन्देश था जिसमे लिखा था GooD MorninG DixiT SiR :) . वो मेसेज पढ़कर गौरांग की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत रिप्लाय किया। साथ में एक Thank You भी लिखा।
फिर ऑफिस में एक फ़ोन आया उसे उठाया तो पता चला की दूसरी तरफ अंशिता है और कह रही की जो चोकलेट आप ने दी थी वो अब भी मेरे पास है और उसे आप के साथ ही मिलकर खाना है, पर ऑफिस में नहीं। फिर उस शाम को दोनों ने प्लान किया कहीं जाकर चॉकलेट खाते है फिर सबसे से बचते बचाते, शहर भर के रास्तों में भटकते हुए , दोनों एक चौराहे के पास पहुंचे जहाँ कार्नर पर खड़े पानी पूरी वाली की दुकान पर जा कर चोकलेट खा कर आये। छोटे शहरों की यह बड़ी विडम्बना है आप किसी से स्वतंत्रता पूर्वक मिल नहीं सकते , वहां आप को कोई न कोई जनता है | फिर भी दोनों ने बड़ी हिम्मत कर कर यहाँ पर अपनी दोस्ती की पहली परीक्षा पास कर ली थी , यहाँ से शुरू हुआ सिलसिला एक आदत से बन गई, अब दोनों अक्सर एक दूसरे से फोन पर बात करते, ऑफिस में कभी कभी मिल लेते, अपने सुख दुःख, कह सुन लेते , कुछ दिनों के बाद दोनो को एक दुसरे की कमी खलने लगी, अपने सुख-दुःख,पसंद नापसंद एक दुसरे से बांटते, एक दुसरे को देखने,मिलने ,बात करने, के बहाने ढूंढते।
बात करने का काम आँखे करने लगी। अब कचोरी खाना तो उनके लिए सिर्फ एक बहाना बन कर रह गया था। उनके मिलने का एक मात्र स्थान जहाँ वे कुछ देर को ही सही अक्सर मिलते रहते थे। एक दिन अंशिता ने गौरांग से सैंडबिच खाने की इक्षा जाहिर की तो दोनों शहर के थोड़े कम नामी फास्टफूड रेस्टोरेंट में गए ताकि भीड़ से दूर कुछ पल सुकून के साथ बिताये जा सकें, जहाँ उनको घूरने वाली आँखे न हो। उन्होंने सैंडबिच का ऑर्डर दिया, फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला अंशिता ने बोलना सुरु किया तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और गौरांग उसे अपलक देखता जा रहा था उसकी बातों में हाँ से हाँ मिलाता जा रहा था। अंशिता बीच में एक दो बार पूछती जरुर क्या देख रहे हो गौरांग ??
गौरांग : कुछ नहीं सिर्फ तुम्हे ??
अंशिता : पर इस तरह इतने ध्यान से क्यों ?
गौरांग : पता नहीं आच्छा लगता है तुम्हे देखकर, तुम्हारी बातें सुनकर , तुम्हारे साथ होकर . . ! तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से नज़र हटाने का मन ही नहीं करता। बस ऐसा लगता है तुम्हे देखता रहूं
अंशिता : अच्छा अच्छा बस करो बाबा, सैंडबिच आ गई है जरा इसे भी देख लो ।
गौरांग : कौन कम्बखत यहाँ खाने के लिए आया है
(साथ में मुनब्बर राना साहब का एक शेर भी चिपका दिया)
बस तेरी मोह्हबत में चला आया हूँ वरना,
यूँ सबके बुलाने से दीक्षित जी नहीं आते।।
और जोर-जोर से से हसने लगा गौरांग। थोड़ी बहुत चमक तो अंशिता के चेहरे पर भी आ गई थी। बातों के दौरान जो आँखों और मुस्कराहट की जुगलबंदी दोनों को किसी और मुकाम पर जाने के लिए प्रेरित कर रही थी। उन्होंने वहां पर बैठ कर बहुत देर तक बहुत सारी बातें की, दोबारा कब और कहाँ मिलना है ये भी तय करते रहे, दोनों की अपनी अपनी सहमती असहमती भी थी।
फिर यकायक गौरांग ने अंशिता की हथेली को अपनी दोनों हथेली के बीच में जम कर थाम लिया। अंशिता थोडा सा सहम सी गई पर जब उसने गौरांग की तरफ देखा तो सारी आशंकाए, डर हवा हो गई। गौरांग ने अंशिता की गर्म हथेली का एहसास पाकर उसने कहा "इस दुनिया को भी तुम्हारी हथेली की तरह गर्म और नर्म होना चाहिये,जिसे थामने के बाद कुछ और पाना बाकी न रह जाये।
"क्या हो गया है तुम्हे आज ? कैसी कैसी बाते कर रहे हो ??"
सच बोल रहा हूँ अंशिता।
सुनकर अंशिता थोडा चिंतित तो हो गई थी पर उसने अपनी चिंता को चेहरे पर हावी नहीं होने दिया। और वे दोनों वहां से अपने-अपने घर चले गए। शाम को अंशिता ने गौरंग को मेसेज कर के पूछा ??
अंशिता : मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे तुम कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं रहे हो ??
गौरांग - हाँ, कहना नहीं पूछना है।
अंशिता - हाँ पूछो न, इतना क्या सोच रहे हो ??
गौरांग- इस पूछने ना पूछने पर बहुत कुछ निर्भर करता है।
अंशिता . . . ! हम और हमारी फ्रेंडशिप का फ्यूचर भी . !
अंशिता- ऐसा क्या पूछना है ?
गौरांग : तुम मेरी फ्रेंड तो हो ना ??
अंशिता : इसमें कुछ पूछने जैसा क्या है ? तुम्हे सिर्फ यही पूछना था?
इस मैसेज आते ही अंशिता का कॉल भी आ गया।।
उसने पूछा क्या हुआ है आप को ?? जो भी बोलना है या पूछना हो पूछो ना ?
बातों को इतना घुमाते क्यों हो,
गौरांग - अच्छा, ठीक है ( गहरी सांस लेते हुए )
गौरांग - तुम अपने दिल की जवां धडकनों को गिन के बता. . .
मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं . . .
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं . . ?
बस इतन कहते कहते उसके दिलों की धड़कने इतनी तेज़ हो गई, उसे कुछ समझ नहीं आया की उसने ये ठीक किया या नहीं दूसरी तरफ से भी कोई आवाज नहीं आ रही थी यहाँ गौरांग अपने दिल की धडकनों को नहीं संभाल पा रहा था। इसी बीच उस तरफ से अंशिता ने फ़ोन कट कर दिया। अब गौरांग और भी ज्यादा वैचैन हो उठा। वह यह निर्णय नहीं कर पा रहा था उसने कहकर सही किया या गलत। उसे एक अजीब सा महसूस हो रहा था उसे सांस लेने के लिए और अधिक ओक्सीजन की जरुरत पड़ने लगी, और वह अपने कमरे से निकल कर बालकनी पर आ गया।
सामने के पेड़ पर पक्षियों की चहचहाट के बीच गहरी सोच में डूब गया। उसे ड़र था कहीं अंशिता उससे बात करना बंद न कर दे , हमारी दोस्ती यूँ ही ख़तम न हो जाये, उसे आत्मग्लानि भी थी उसने ऐसा क्यों बोला ? हज़ारों सवालों का सैलाब उसके अंदर उमड़ घुमड़ कर रहा था| तभी उसके मोबाइल पर रिंग बजने लगी काल उसके घर से था पर अभी उसका बात करने का मन नहीं था तो उसने रिसीव नहीं किया। फोन बज कर बंद हुआ तो फिर एक मैसेज से चहक उठा, मैसेज अंशिता का ही था पर उसे खोलने में साहब को डर भी लग रहा था और उत्सुकता भी थी। मैसेज में एक गाने के कुछ बोल लिखे थे " तेरा मुझ से है पहले का नाता कोई यूँ ही नही दिल लुभाता कोई . . . . !
इतने में भाई का फोन फिर बज उठा अबकी बार अंशिता का था फोन रिसीव किया तो "ख़ामोशी इधर भी थी उधर भी थी " कोई कुछ बोल ही नहीं रहा था, ख़ामोशी को तोड़ते हुए अंशिता बोली। मुझे आप से कुछ बताना है कल मिलोगे कहीं ?
गौरांग : अभी बता दो
अंशिता : नहीं अभी नही
ठीक है कल सुबह वहीं,
हाँ वहां ठीक है।
इतनी लम्बी रात गौरांग ने कभी महसूस नही की थी सुबह हुई तो महाशय वहां पहले से मौजूद थे पर वहां और भी जानने वाले लोगों का भय भी था इतने में अंशिता अपनी रेड कलर स्कूटी से वहां आ गई। दोनों ने बात शुरू की तो वहां से उन्हें पहचानने वाले भाई साहब उसे दिख गए, अक्सर शांत रहने वाला गौरांग असहज हो उठा और अंशिता से बिना बात करे चला गया। कारण सिर्फ यही कि वह लोगो को बिना मतलब बहस का कोई मौका नहीं देना चाहता था, पर इस बात पर अंशिता को गुस्सा आ गया। फिर उसने दिन भर गौरांग का कॉल रिसीव नही किया, न किसी मैसेज का जबाब दिया गौरांग के दिल में आया कि उसके घर पर जा कर मिल आए. फिर पूरा दिन गुजरने के बाद शाम को मैसेज आया, मुझे तुम्हे यह बताना था कि हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त रह सकते है इससे ज्यादा कुछ नहीं। घर वालों ने मेरे लिए लड़का पसंद कर लिया है। कुछ दिनों में मेरी शादी भी हो जाएगी।
गौरांग ने मैसेज पढ़ा और स्तब्ध रह गया, उसकी आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया गया, दिल की धड़कने थम सी गई, वह यह भूल सा गया की साँसे कैसे ली जाती है, उसके उतरे हुए चेहरे पर ठंडा पसीना साफ़ नजर आ रहा था, फिर उसने आव देखा न ताव सीधे अंशिता को फोन लगाया, पर ये क्या ? अंशिता ने कॉल रिसीव ही नहीं किया। दोबारा भी नहीं, तीसरी बार भी नहीं। अब गौरांग का पारा सातवे आसमान पर था कि इतने में अंशिता का मैसेज आया मै अभी बात नहीं कर सकती। पर गौरांग फोन पर फोन लगाए जा रहा था, और जैसे ही अंशिता ने फोन उठाया और बोला, हैलो गौरांग . . . .तुम समझ क्यों नहीं रहे हो,
सारा गुस्सा गायब, और बड़े प्यार से बोला हमेशा की तरह , हाँ अंशिता बोलो ;
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गौरांग ने मैसेज पढ़ा और स्तब्ध रह गया, उसकी आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया गया, दिल की धड़कने थम सी गई, वह यह भूल सा गया की साँसे कैसे ली जाती है, उसके उतरे हुए चेहरे पर ठंडा पसीना साफ़ नजर आ रहा था, फिर उसने आव देखा न ताव सीधे अंशिता को फोन लगाया, पर ये क्या ? अंशिता ने कॉल रिसीव ही नहीं किया। दोबारा भी नहीं, तीसरी बार भी नहीं। अब गौरांग का पारा सातवे आसमान पर था कि इतने में अंशिता का मैसेज आया मै अभी बात नहीं कर सकती। पर गौरांग फोन पर फोन लगाए जा रहा था, और जैसे ही अंशिता ने फोन उठाया और बोला, हैलो गौरांग . . . .तुम समझ क्यों नहीं रहे हो,
सारा गुस्सा गायब, और बड़े प्यार से बोला हमेशा की तरह , हाँ अंशिता बोलो ;
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