गुरुवार, 16 अगस्त 2018

स्वतंत्रता दिवस और शादाब


जब भी १५ अगस्त और २६ जनवरी होती है तो मुझे अपने स्कूल के दोस्त याद आते है। और शादाब मेरा मेरे बचपन का वो दोस्त जिसके साथ मैंने अपने स्कूल के सबसे ज्यादा राष्ट्रीय त्यौहार मनाये है। क्लास ९ वी में हम दोनों एक साथ एक बैंच पर बैठते थे. फिर १० वी में बैंच बदली लेकिन दोस्त नहीं। क्लास ९वी का पहला स्वतंत्रता दिवस शुरू हुआ उत्कृष्ता विद्यालय से और पहुंचा तहसील ग्राउंड की परेड देखने वाह भाई वाह क्या परेड थी, उसके बाद पप्पू भाई( असाटी जी ) की चांट की दुकान पर समोसे फिर शादाब के पुराने स्कूल (आदर्श स्कूल) पहुचे और फिर घर बापसी। हमारे घर लौटने का रास्ता भी एक,  रास्ते भर ढेर सारी बातें। यह हमारा रोज का नियम था स्कूल से आराम से निकलते और बात करते करते घर जाते, और हमारी  मित्रता ऐसी कि किसी की भी नजर लग जाये। यूँ समझिये लगते लगते बच भी गई (किसी लड़की की बजह से नहीं ) बात दसवीं की है लंच में खाना  खाते खाते कोई बात निकली और हमारे "मत" भिन्न हो गए मजे लेने वालों में एक थे हमारे मित्र चौबे जी,  एक पटेल साब,   मैं और शादाब आमने सामने, बात बड़ी और बढ़ती गई हांथा पाई तक पहुंच गई मैं उसके पीछे डस्टर (असल में कुछ और) लेकर भागा, और दुर्भाग्य से मैं सीधे पंहुचा प्राचार्य कक्ष में !

जिस तरह हमारी दोस्ती मशहूर थी ठीक उसी तरह अगले २ घंटो में हमारी लड़ाई मशहूर हो गई , सब की नजर हम दोनों पर, कि कहीं छुट्टी के बाद आपस में फिर न भिड़ जाये ? छुट्टी की घंटी बजी रोज की तरह मैंने अपना बस्ता उठाया, और शादाब से दूरी बना कर चलने लगा, मन में अजब सी बैचनी थी जितनी बैचनी बढ़ रही थी उतनी ही हमारे बीच की दूरी कम होती जा रही थी क्यों की साईकिल तो हमारी आजु बाजू ही होती थी गुरु। उसने अपना बस्ता साईकिल में लगा लिया था पर अभी गया नहीं था और मैं पंहुचा बस्ता  कैरियर में फसाया, स्टैंड अलग किया, और चल पड़े हम दोनों रोज की तरह एक साथ,  पर आज हमारे बीच की बातचीत नदारत थी, एक मौन था हमारे बीच, शायद आत्म ग्लानि का मौन, फिर स्कूल से निकले, तहसील ग्राउंड पार किया, कीर्ति स्तम्भ भी निकल गय, फिर आई पत्थर खदान जहाँ "मौन हार गया" दोस्ती जीत गई,  रोज की तरह बात शुरू हुई।   किसने की यह जरुरी नहीं, जरुरी तो यह बताना है की उस दिन न मैंने sorry बोला न शादाब ने, न ही  जरुरत समझी गई,  लेकिन क्षमा हमारे स्वाभाव में था, जो हमारी बात चीत में  अंतर निहित था. 


हमेशा स्वतंत्रता दिवस पर शादाब याद आ ही जाता है क्यों की स्कूल और स्कूल के बाद भी हम ने राष्ट्रिय पर्व एक साथ मनाये है।  आज का दिन दोस्त की याद के नाम 
( आगे भी सुनाऊंगा और भी दोस्तों से जुड़े किस्से ) 




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