शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

पतझर

झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
पहले पड़ी धूप, फिर धूल जम गई,
सारे दरख्तों की रंगत उतर गई,
मुरझा के अपनी शाख पे , कुछ पत्ते अकड़ गये,
रिश्ता जब टूटा शाख से, जमीं में मिल गए,
तनहा तनहा डाल ने कुछ दिन यूँ ही बिताये,
चिड़िया, तितली ,कोयल न कौए उसके पास आये।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से, 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे ।।
जब से तुम गई हो तो, हम भी झर गए
तुम्हारी याद में जरा टूटे और पूरे बिखर गए
ये तो जानते  थे कि बिछुड़ना है एक दिन
उमीदें फिर भी पत्ते शाख से कर गए
आया ना कोई भी इनको सँभालने 
पत्तों ने लुटा दिया सब पतझर के नाम पे।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
न कोई नाम न कोई पहचान रही
जमी पर गिरे और खाक हो गए 
गुमा था कभी फूल को अपनी महक का
चंद रोज मे ही सूख के झर गए
पूछो दरख़्त से पतझर की पीड़ाये
कांधो पे जैसे बेटे की लाश हो
जंगल कुछ पतझर में इस तरह उदास हो।।
झर झर के झर गए पत्ते जो शाख से 
आँखों में जैसे लहराते हुए ख्वाब थे।।
-अनिमेष सिंघई

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