अमीष ने अभी अभी फिर खुद को समझा बुझा कर अपने आप को तस्सली दी थी। पर जिन्दगी कहाँ चैन से जीने देती है एक बार फिर इतिहास उसके वर्तमान में भविष्य के लिया बाधा बनकर खड़ा था । हाँ खड़ी थी वो लड़की जिसे कभी वह अपना भविष्य बनाना चाहता था शायद आज भी बनाना चाहता है . ! पिछले कई महीनो से उससे कुछ मिनिट उस उधार मांग मांग कर उसका गला कुछ बैठ सा गया था जुबान समय पर पलटती ही नहीं थी. .जब वो सालो बाद मिलकर बोली बोल दो जो बोलना है तब उसका दिमाग इस गुणा भाग में लग गया कि कही कोई बात उसको लग ना जाए । कितनी शिकायते थी उसे उससे । जब संगती ने उससे कहा की कैसे बीत गए इतने साल कुछ पता ही नहीं चला , तब जबाब में अमीष की जुबान बिना कुछ सोचे कैची की तरह खच से चली, उसकी बात काटी और दुबक गई. बस उसने इतना ही कहाँ जब साथ हमसफ़र हो तो सफर का पता नहीं चलता और तन्हाईयो में एक पल भी सदियों की तरह गुजरता है। मुझे आज भी याद है जब पहली बार उसे दूसरी मंजिल की पहली सीडी पर भागते हुए मिली थी और फिजिक्स वाले श्रीवास्तव जी को पूछ रही थी उसने भी इनकार में सिर हिला कर असहमति जता दी थी वो थी उसकी पहली पहचान मुलाकात । उसके बाद वे दोनों मिले उस कार्यक्रम में जिसने पुरे देश को जोड़ कर रखा था दामिनी दुष्कर्म के विरोध में चल रहे एक आन्दोलन में . . जिस में तब अमीष ने माइक संभाला हुआ था और दुष्यत जी की गजल से अपने वक्तव्य का समापन किया था।
पंक्तिया थी. . .
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए.
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
शायद ये पंक्तिया संगती को पसंद आ गई थी उसने ऐसा अमीष से कहा । शायद सच यह था कि पसंद आ गया था अमीष । बाद में अगले दिन वो उन लाइनो को लिखवाने के बहाने उसे ढूढ़ते हुए उसके पास चली गई थी, कुछ एक दो फॉर्मल टाइप के सवाल जबाब के बीच अमीष ने उसे कविता लिखवा दी। उसके बाद कुछ महीनो तक जब भी वे जहाँ भी टकराते , दिखते, मिलते, तो एक सुन्दर सी मुस्कान के साथ हम एक दुसरे को इस बात का एहसास दिलाते कि हम अभी भी एक दुसरे को भूले नहीं है, और न अमीष उसे भुलाना चाहता था।।
फिर एक दिन वह कंप्यूटर लैब में संयोग से उसके बाजू में आकर बैठ गई थी । उसके बाद उन दोनों के बीच जो बातो का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा लगा जैसे समय उन से जल कर जल्दी जल्दी भागने लगा है घंटे तो मिनटों में कटने लगे। पता भी नहीं चला कब लैब का समय ख़त्म हो गया था उसे समझ नहीं आ रहा था साधारण सी दिख़ने वाली उस आसाधारण लड़की में ऐसा क्या था जिसे पिछले 22 सालो में पहली बार खयालो से मिटा नहीं पा रहा था अगले दिन का इंतज़ार कभी भी इतनी बेसब्री से नहीं किया था । तब भी नहीं जब उसे नई मोटर साइकिल मिलने वाली थी और तब भी नहीं जब उसका चार साल बाद जन्म दिन आने वाला था। इस तरह मिलने का सिलसिला कुछ दिनो तक यूँ ही चलता रहा। फिर जब उनको लगने लगा उनका इसतरह मिलना बाकि लोगो को खलने लगा है तब उन्होंने बात करना शुरू किया मोबाइल पर और मिलना लाइब्रेरी में लेकिन दुनिया की नजर में वे अभी भी अजनबियों से कम नहीं थे।
फिर एक दिन वह कंप्यूटर लैब में संयोग से उसके बाजू में आकर बैठ गई थी । उसके बाद उन दोनों के बीच जो बातो का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा लगा जैसे समय उन से जल कर जल्दी जल्दी भागने लगा है घंटे तो मिनटों में कटने लगे। पता भी नहीं चला कब लैब का समय ख़त्म हो गया था उसे समझ नहीं आ रहा था साधारण सी दिख़ने वाली उस आसाधारण लड़की में ऐसा क्या था जिसे पिछले 22 सालो में पहली बार खयालो से मिटा नहीं पा रहा था अगले दिन का इंतज़ार कभी भी इतनी बेसब्री से नहीं किया था । तब भी नहीं जब उसे नई मोटर साइकिल मिलने वाली थी और तब भी नहीं जब उसका चार साल बाद जन्म दिन आने वाला था। इस तरह मिलने का सिलसिला कुछ दिनो तक यूँ ही चलता रहा। फिर जब उनको लगने लगा उनका इसतरह मिलना बाकि लोगो को खलने लगा है तब उन्होंने बात करना शुरू किया मोबाइल पर और मिलना लाइब्रेरी में लेकिन दुनिया की नजर में वे अभी भी अजनबियों से कम नहीं थे।
सुबह उठकर उसकी पहली कोशिश होती थी की बस एक बार संगती दिख जाए और जिस दिन रविवार होता तो दिन भर यही लगता किं शहर में कहीं टकरा जाए ,एक झलक मिल जाये बस। ऐसा होता भी कि अक्सर नजदीक की डेली नीड्स शॉप पर वह उसे मिल ही जाती थी। अभी तक उन्होंने एक दुसरे को अपने जज्बातो के बारे में बताया तो कुछ भी नहीं था पर ऐसा भी नहीं था वे दोनों कुछ समझ भी नहीं रहे थे संगती भी ये समझती थी अमीष को कहना क्या है और शायद अमीष भी पर आखिर कहे कौन?? अमीष की आँखे उसे सिर्फ देखती ही नहीं थी वल्कि कुछ बोलती भी थी जिसे संगती समझ जाती थी । पर संगती कि किसी सहेली ने उसके मन में ये बात भर के रखी थी कि "लड़के लडकियों को धोखा देते है सब लड़के एक जैसे होते है पहले प्यार का नाटक करते है फिर ब्लैक मेल टाइप " ये बात हमेशा अमीष सामने एक चुनोती रही और इसी कारण वो आज भी शायद अमीष पर उतना भरोसा नहीं करती जितना वह उससे प्यार करता है । पर बो दिन आ ही गया जब पूरा आसमान रंगीन पतंगों भरा था और शहर की गलियों में घुली थी गुड और तिल की सौंधी महक, अमीष को पता नहीं था गुड की मिठास आज उसकी जिन्दगी में मिठास भरने वाली थी आज उसके जीवन का प्रेम रूपी सूरज उत्रायण में प्रवेश करने वाला था। वह संगती का इन्तजार लाइब्रेरी में कर रहा था जब वो आई तो उसके दिल की धड़कन नियंत्रण से बहार हो गई उसे ऐसा लग रहा था जैसे दिल शरीर के बाहर धड़क रहा है और चारो तरफ मधुकामनी और हर श्रृंगार की मादक महक फैली हो. कोई मधुर संगीत बज रहा हो। उसको देखकर उसका चेहरा कुछ ऐसे खिल गया जैसे सूर्य की पहली किरण के साथ कमल खिल जाता है ख़ुशी इतनी कि जैसे कि चाँद को देखकर चकोर और बारिश की पहली बूंद में पपीहा खुश हो जाता है । लाइब्रेरी में अन्दर जाते ही अमीष और संगती दुसरे की तरफ पीठ कर के खड़े थे अलमारी में किताबों को देखने का दिखावा करने के लिए क्यों किसी को समझ नहीं आ रहा था बात कहाँ से शुरू करें और कौन सी ? संगती भी सोच रही होगी कैसा बुद्धू लड़का है बात करना भी नहीं आता इसे तो और जब देखो तब बड़ी बड़ी बाते करता है । अमीष की यही तो कमजोरी रही है जब वो सामने आती थी तो भूल जाता था क्या बात करना है और जब फुर्सत होता यही सोचता रहता की क्या क्या बात करनी है । फिर संगती ने ही ख़ामोशी को तोड़ते हुए बोला. . ऐसा क्यों होता ??? अमीष ने भी कुछ चुने हुए शब्दों में कहाँ बस हो जाता है जिस से होना होता है . . !
पर क्या . . . ?? ये बोलने की जरुरत न संगती को थी न अमीष को। फिर थोड़ी देर उनदोनो ने यहाँ वहां की बाते कीं। लौटते समय जब संगती ने अपनी गर्म हथेली अमीष के ठन्डे पंजे सेे हांथ मिलाने को आंगे की तो अमीष ने उसे कुछ ऐसे थाम लिया जिसे उसे कभी भी न छोड़ना चाहता हो और न ही संगती ने उससे छुड़ाने का प्रयास किया। बस यूँ ही कुछ देर थामे रहे वे एक दुसरे का हाँथ ऐसा लग रहा था जैसे फीलिग्स का डाटा हैण्ड टू हैण्ड ट्रान्सफर हो रहा है वैसे अमीष उसे जाने तो नहीं देना चाहता था पर समय की अपनी सीमा है और फिर संगती घर चली गई ।
अमीष उन पलो को महसूस करते हुए मन ही मन खुश होंते हुए थोडी देर बाद घर चला गया उसने घर जा कर देखा तो, मोबाइल में उसके लिए संगती के कुछ मैसेज थे जिसमे उसने पुछा था कि अमीष उससे क्या कहना चाहता है ? संगती ने लिखा कि मुझे आज ऐसा लगा आप कुछ बोलना चाहते हो और बोल नहीं रहे. . . . . बोलो ना क्या बोलना है ? थोड़ी देर आना कानी के बाद दुनिया के सबसे खूबसूरत और वेश कीमती शब्द जो आज तक शायद अमीष ने उसके लिए ही बचा कर रखे थे बोल ही दिए . . . ! एक दम सन्नाटा सा छा गया । अमीष का मैसेजे पढने के घंटे भर तक कोई जबाब नहीं आया । तब तक उसका मन इतना व्याकुल इतना घबरा गया कि कहीं उसने बोल कर गलती तो नहीं कि . .! एक अच्छा दोस्त तो नहीं खो दिया, क्या सोच रही होगी संगती मेरे वारे में ?? इसी उधेड़ बुन में बीता एक घंटे का समय न खाने का होश न समय का ध्यान।
फिर उसने पुरे 72 मि. बाद संगती ने अमीष से पुछा "ऐसा क्या है जो आप मुझे इतना पसंद करते हो ?
फिर अमीष ने थोड़ी देर का समय माँगा और बोला 10 मिनिट बाद बताता हूँ और वो समझ गई कि उसको कोई ख़ास उत्तर अमीष के अपने ख़ास अपने अंदाज़ में मिलेगा
फिर अमीष ने एक टूटी फूटी कविता में अपना जबाब लिखा-
फिर अमीष ने थोड़ी देर का समय माँगा और बोला 10 मिनिट बाद बताता हूँ और वो समझ गई कि उसको कोई ख़ास उत्तर अमीष के अपने ख़ास अपने अंदाज़ में मिलेगा
फिर अमीष ने एक टूटी फूटी कविता में अपना जबाब लिखा-
संभव है तुम्हारी आंखे सुंदर ना हो. पर मुझे तुम्हारा नजरिया पसंद है . .
संभव है तुम्हारी आवाज सुरीली ना हो. पर मुझे तुम्हारे गीत पसंद है . .
संभव है तुम्हारी बात पसंद ना हो . पर तुम से बात करना बहुत पसंद है . .
तुम्हे लिखना पसंद नही . .पर तुम्हारी लिखावट बहुत पसंद है . .
तुमसे हमेशा मिलना संभव नही .. पर तुम्हे देखना पसंद है . .
संभव है तुम्हारी आवाज सुरीली ना हो. पर मुझे तुम्हारे गीत पसंद है . .
संभव है तुम्हारी बात पसंद ना हो . पर तुम से बात करना बहुत पसंद है . .
तुम्हे लिखना पसंद नही . .पर तुम्हारी लिखावट बहुत पसंद है . .
तुमसे हमेशा मिलना संभव नही .. पर तुम्हे देखना पसंद है . .
तुम व्यस्त बहुत हो. .पर व्यवस्थित हो. .मुझे यह भी बहुत पसंद है
तुम्हारा हसना, बोलना , देखना , दिखना , मुस्कुरना , बाते करना , मिलना, टोकना, रोकना, पूछना, बताना, सब पसंद है . .
तुम्हारा हसना, बोलना , देखना , दिखना , मुस्कुरना , बाते करना , मिलना, टोकना, रोकना, पूछना, बताना, सब पसंद है . .
आज से दो दोस्त -प्रेमी हो चुके थे पर बिडम्बना तो देखिये वे दोनों दिन भर एक ही जगह होने के बाद मिल नहीं सकते थे बात नहीं कर सकते थे दुरी भी सिर्फ ग्राउंड फ्लोर से सेकंड फ्लोर तक । बस देख सकते कैंटीन में और आते जाते। संगती को शायद यह पता ही नहीं हो कि गुप्ता जी की कैंटीन में 9 बजे अमीष चाय पीने नहीं बल्कि सिर्फ उसे देखने ही जाता था चाय तो सिर्फ एक बहाना था असल मकसद तो कुछ और ही था। अमीष का दिन तो सिर्फ संगती मुस्कराहट भर से कट जाता था और जब तक उसको देख न लो मन को चैन नहीं मिलता था। उठ तो 7 बजे जाता था लेकिन जागता था 9 बजे संगती को देखने के बाद। पर उनकी तकदीर को कुछ और ही मजूर था।
इजहार ये मोह्हबत के ठीक 15 दिन बाद जब पूरी धरा पर बसंत छाया हुआ था प्रकृति अपनी सुन्दरता लुटा रही थी तब उसने अमीष को आने वाले पतझर की झलक दिखाई उन 15 दिनों में एक पूरी जिन्दगी जी थी अमीष ने । कभी किसी सड़क किनारे गुपचुप तरीके से गुपचुप (पानी पूरी) खाना, या संगती के टिफिन को सब से छुप कर खाना, एक बार जब वो मटर पुलाव लाई थी तो अमीष ने सब से छुपकर खाया और आज भी अक्सर याद करता है वो स्वाद। एक बार जब संगती से मिलने नीचे शॉप पर गया तो वो कुछ घर के लिए जरुरी सब्जी फल ले रही थी उसने अमीष के लिए एक पपीता भी ले कर रखा था जब अमीष ने लेने से मना किया तो प्रेम और अधिकार से उसके हाँथ रखकरचली गई वो भी अपनी अमिट मुस्कान के साथ . जब भी बाजार में पपीते को देखता होगा तो उसको वे पल याद आ ही जाते होंगे उस पपीते का पीला पन आज भी अमीष के चेहरे पर उतर आता है उसे याद आ जाती है पपीता लिए अल्हड लड़की, कुछ इस तरह बढ़ रही थी अमीष-संगती कहानी लेकिन पूर्णिमा का चाँद अब अमावश्या की और बढ़ गया था वो भी ऐसी अमावशी काली रात जिसने ना तो सूरत को निकलने दिया ना फिर अमीष को चैन से सोने।
एक शाम को अमिष और संगती लाइब्रेरी में मिलने बाले थे पर संगती को देर हो गई और उन दोनों ने अपना मिलना तय किया संगती के घर के पास पानी पूरी के ठेले पर, तब संगती ने अमीष को बताया कि अव उसकी शादी कि बात होने लगी है और मम्मी पापा लड़का देखने गए है। देर हो रही थी इसलिए वे अगले दिन दोपहर में मिलने का तय करके चले गए। लेकिन अमीष का मन बहुत वेचैन था वे देर रात तक टेक्स्टिंग करते रहे अमीष उसे वो अमीष को समझाते रहे। पर सुबह सुबह ही संगती अचानक उसे मिलने को बुलाया लेकिन जब अमीष गया तो किसी बात पर वह उससे गुस्सा होकर बोला " तुम्हे जिस चीज से बचाना चाहो तुम वही करती हो " ये बात शायद संगती चुभ गई।वे दोनों वहां से चले गए लेकिन जब शाम को अमीष ने संगती को कॉल किया तो रेसिव नहीं किया, कई बार किया, वो उसके मैसेज का भी जबाब नहीं दे रही थी उसके 22 कॉल और 14 मैसेज किये अपना पूरा हाल सुना डाला। संगती ने सिर्फ एक मैसेज किया और लिखा अब हम कभी बात नहीं करेगे ,न बात करेगे न मिलने की इक्षा होगी ।अमीष बेसुध सा बैठा ट्रेन का इंतज़ार करता रहा, उसे उस दिन घर जो जाना था। बहुत लम्बी रात थी ये अमीष के लिए। अगले दिन सुबह संगती का फ़ोन कॉल आया और बोली मै आप से गुस्सा नहीं हूँ बस आप को थोड़ा परेशान करना था। तब जा अमीष थोडा ठीक हुआ। एक बात सच बोली थी संगती ने की वो कभी बात नहीं करेगी,उसने की भी नहीं । क्यों कि उस दिन उसकी शादी तय हो चुकी थी उसके बाद उन दोनो ने एक आखरी बार मिलने का तय किया। लेकिन वे फिर कभी नहीं मिल सके,हमारे सामाजिक पैबंद फिर से उनके प्रेम के बीच अद्रश्य दीवार बन कर खडे थे। आखरी बार मिल के जो कहना था उसे वो अब भी बाकी है। मुझे आज भी आश्चर्य है कि कोई एक दिन सिर्फ एक दिन में इतना कैसे बदल सकता है। क्या उसको कभी भी याद नहीं आती होगी ? कोई भी रिश्ता एक दिन में ख़त्म हो सकता है ? कुछ ही दिनों में दो अच्छे दोस्त अजनबियों में बदल गए । मैंने उसको कई दफा आमने सामने गुजरते देखा पर उन्होंने कभी नजरे नहीं मिलाई। पहले कभी उसी बिल्डिंग में मिलनेके बहाने खोजते थे और आज एक दुसरे से भागते फिरते है । लेकिन उनके मन आज भी एक है शायद इसलिए एक दुसरे को पर्याप्त स्थान दिया है । किसी को किसी से कोई शिकवा नहीं अमीष संगती की यादो में आज भी मशगूल है। एक दिन गलती से ही सही संगती से अमिश को कॉल लग गया। फिर वही समस्या कि बोले कौन और क्या ? वक़्त ने फिर खुद को दोहराया फिर वही दिन आया जब पहली बार मिले थे वे दोनों और इस बार भी उसी दिन मिले पर फर्क सिर्फ इतना था कि उस दिन मिले तो मिलते गए और अबकी बार मिले तो फिर कभी न मिलने के लिए ।।
उसने जाते जाते अमीष से कहा कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा पर इतने सालो में कुछ भी ठीक नहीं हुआ। कोई एक दिन नहीं जब वो उसे याद नहीं आती। सोचता है कि वो उसको भूल जाये। पर ऐसा कर नहीं पाता। उसके न भूलने पर मेरी एक कविता
फिर उसको भुलाने बैठे फिर उसी की याद आई ।।
वैसे तो तस्वीरे सारी मिटा के गई थी,
फिर ना जाने वो आँखों में कहा से उतर आई ।।
फिर ना जाने वो आँखों में कहा से उतर आई ।।
कुछ ख्वाब अब भी उसके बिना अधूरे है,
न जाने वो नीदें चुरा कर कहा रख आई ।।
न जाने वो नीदें चुरा कर कहा रख आई ।।
एक रोज शाम को उसने कहा गलत है ये,
ना जाने क्यों मेरी आँखे भर आई ।।
ना जाने क्यों मेरी आँखे भर आई ।।
नज़रे मिला के मिलती थी जो मुझ से,
ना जाने नज़रे चुराना कहां से सीख आई ।।
ना जाने नज़रे चुराना कहां से सीख आई ।।
वो जो नूर थी कभी मेरे चेहरे का,
आखरी बार मिलके सारी रंगत लूट लाई ।।
आखरी बार मिलके सारी रंगत लूट लाई ।।
अव कहाँ वो मुझ से मिलती जुलती है,
सारे बहाने मिलने के दरिया में फेक आई ।।
सारे बहाने मिलने के दरिया में फेक आई ।।
द्वारा :-
अनिमेष सिंघई
अनिमेष सिंघई
bahut sundar
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