पानी, जल, नीर , वारि इत्यादि इत्यादि नामो से प्रचलित जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग. आज जहाँ भी जीवन संभव है इसके बिना संभव ही नहीं है कम से कम हमारी इस धरती पर तो नहीं । आज कल वैज्ञानिक धरती के परे भी जीवन की खोज में लगे है। मंगल,चंद्रमा, वृहस्पति तो उनके पसंदीदा गृह है । आज शायद ही कोई हो जो जल के महत्त्व नहीं जानता। उसके सामर्थ्य को भी, जल के अन्दर ही वो सामर्थ्य है कि मिनटों में पूरी धरती को समाप्त कर सकता है । मरुथल को सागर और सागर को मरुथल कर सकता है । धरती पर 70% जल है फिर भी हमारे देश में अधिकांश गाँव, कस्वो, शहर , यहाँ तक कि महानगरो में भी जल की समस्या से दो चार होना पढता है । पानी की कमी से जहाँ एक ऒर किसानो की फसल पर बुरा प्रभाव पढता है तो वही दूसरी ऒर उद्योगो का विकास भी रुक रुक जाता है। जिस तरह एक राष्ट्र में एक अर्थव्यवस्था के लिए रूप रेखा (गाइड लाइन ) है वैसे ही जल व्यवस्था के लिए भी होना आव्यश्यक है और उसपर नियंत्रण भी हो ताकि वर्तमान और भविष्य के साथ आने वाली समस्या का समाधान हो सके । छोटे शहरों में हालत बहुत ही पीड़ा जनक है लोगो को 5-7 कि.मी. तक पानी लाने जाना पढता है मुझे आज भी अपना बचपन के वो दिन याद है जब गर्मी के मौसम तो छोडिये, दिसंबर की हाड कंपा देने वाली ठण्ड में भी पिता जी आधी रात में पानी लाते थे। सिर्फ पिता जी ही नहीं आस पड़ोस के सभी लोग यही करते थे। ऐसी ठण्ड जिस में लोग दिन में भी निकलने से कतराते थे उस समय आधी रात को पानी भरना कितना कष्टप्रद था। हमारा परिवार तो छोटा था पर जिनका परिवार बड़ा था उनकी आधी से ज्यादा रात तो सिर्फ पानी ढोने में ही निकल जाती थी। साइकिल पर अपनी क्षमता के अनुसार चार छे और आठ डिब्बे टांग कर फ़िल्टर या फिर मंडी से पानी लाना एक आम बात थी । पड़ोसियों से लड़ाई की मुख्य बजह में एक पानी ही हुआ करती थी । गर्मियों के दिनों में एक शीत युद्ध जैसा वातावरण हुआ करता था। जब नल खुलते थे तो सारी गली पानीपथ का मैदान लगती थी जहाँ हर कोई पानी के लिए मारा मारी करते रहते थे , जिस दिन सुबह पानी आना होता था उस के पूर्व रात को सारे इंतजाम कर लिए जाते थे। सारे अश्त्र शश्त्र तैयार हो जाते थे। पानी की पाइप लाइन रात को ही घर के विभिन्न हिस्सों में बिछा दी जाती थी। ताकि सुबह एक भी मिनिट और एक बूंद पानी बर्बाद ना हो, घर की हर वो छोटी से छोटी चीज जिस में पानी भरकर रखा जा सकता है भर लिया जाता था । पता नहीं होता था अब कब पानी आयेगा। गर्मी के दिनों में जब पानी की सप्लाई टैंकर से होती थी तब लोग तवे के समान तपती सडको पर नंगे पैर भागा दौड़ी करते थे और टैंकर से ऐसे चिपकते थे जैसे कोई मक्खी चासनी से चिपकती है और जब तक बूंद बूंद पानी भी ना निकाल ले तब तक चैन नहीं लेते थे। पानी सामाजिक संघर्ष का पर्याय बन गया था। रिश्तेदारो का आना जाना भी पानी पर निर्भर करता था। कई रिश्तेदार तो पानी कि किल्लत के कारण भी हमारे यहाँ नहीं आते थे और हद तो तब हो जाती थी जब हम खुलकर उनको बुला भी नहीं पाते थे। जब की गर्मी से बेहाल लोग दिन में दो और तीन बार नहाते थे तब हम एक बार भी किफ़ायत से नहाया करते थे। पानी के लिए संघर्ष और समझोतो को नजदीक से देखा है लेकिन जब आज लोगो को पानी बर्बाद करते देखता हूँ तो अपना संघर्ष याद आ जाता है । मुझे आज भी याद है जब एक बार पानी भरने गया अपनी छोटी सी साईंकिल पर तो उसे कोई चोरी कर ले गया था पहली साईंकिल थी और घंटो रोया था बैठ कर । कहने को तो सिर्फ पानी था लेकिन हमारे शहर के लिए एक समस्या जिस का कोई हल नहीं दिखता था वैसे तो शहर में आधा दर्जन से अधिक छोटे बड़े तालाब थे पर, पर उनकी हालत तो हम से भी बदतर थी । हम अपना रोना तो रो भी सकते थे पर वे नहीं। दीवान जी की तलैया जल कुम्भी का शिकार थी तो ,पुरैना तला भैस आदि पालतू जानवरो की आरामगाह , बेलाताल को सूर्य की तपन सुखा देता था, तो फूटेरा तालाब सिंघाडे की खेती से ढका हुआ था । उमामिस्त्री की तलैया और कचोरा जैसे तालब मेरे जन्म से पहले ही भूमी गत हो गए थे अब ये मात्र स्थान बचे है । में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ जल का अपना महत्त्व है उसे बचा लीजिये। नहीं तो आने बाली पीड़ियो के लिए हम सिर्फ गैरजिम्मेदार अभिभावक बन कर रह जायेगे ।
गर चाहते है हम लोग जीना मुस्कुराकर
रखना पड़ेगा पानी बचा बचा कर ।।
आपका
अनिमेष
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